सीबकथॉर्न (Hippophae rhamnoides, भारत में लेह बेरी के नाम से बिकती है) सिर्फ ठंडी, सूखी, ऊंची हिमालयी घाटियों, जैसे लद्दाख, के लिए एक व्यावहारिक फसल है, और असल में भारत की ज्यादातर बेरी अब भी जंगली झाड़ियों से आती है, लगाए हुए बागों से नहीं। इस इलाके के बाहर के किसानों को इसे नहीं लगाना चाहिए: झाड़ी को ठंडी सर्दी और खुली धूप चाहिए, और यह गाइड तैयार करते समय बागान के लिए भारत का कोई ट्रायल डेटा, खेती की लागत या buy-back भाव नहीं मिला।

जिन बातों को भरोसे से कहा जा सकता है वे हैं पौधे का जीव विज्ञान (नर और मादा पौधे अलग, हवा से परागण, नाइट्रोजन स्थिरीकरण, बहुत कांटेदार टहनियां), लेह के Defence Institute of High Altitude Research (DIHAR) ने बेरी से जो उत्पाद बनाए हैं, और दूसरे देशों के बाग के आंकड़े। विदेशी आंकड़े नीचे उसी रूप में दिखाए गए हैं और भारत की उपज नहीं हैं।

यह कहां उगती है

  • फैलाव: सीबकथॉर्न भारत, नेपाल और भूटान समेत पूरे हिमालय में जंगली उगती है, और पौधा -43 से +40 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान सह लेता है। कुछ इलाकों में जंगली रूप में यह करीब 5,000 मीटर की ऊंचाई तक पहुंचती है।
  • लद्दाख: लद्दाख की ट्रांस-हिमालयी घाटियों के एक नृजातीय-वनस्पति सर्वे में दर्ज है कि सीबकथॉर्न से जूस बनाया जाता है और पूरे पौधे का इस्तेमाल ईंधन और चारे के रूप में होता है। सर्वे ने जंगली तुड़ाई और खेती को अलग नहीं किया और उत्पादन के आंकड़े या भाव नहीं दिए।
  • रकबा: एक सामान्य संदर्भ बिना मूल स्रोत के भारत में सीबकथॉर्न का रकबा करीब 12,000 हेक्टेयर बताता है, इसलिए इसे अपुष्ट अनुमान मानें। लद्दाख, हिमाचल प्रदेश या उत्तराखंड का राज्यवार पुष्ट रकबा नहीं मिला।
  • फल देने वाले बागों की ऊंचाई: एक सामान्य संदर्भ फल देने के लिए 2,000 मीटर बताता है, जो लद्दाख की हकीकत से मेल नहीं खाता, जहां स्थानीय पौधों से जूस बनता है। लगाए गए बागों की स्थानीय ऊंचाई सीमा की पुष्टि नहीं हुई, इसलिए लगाने से पहले DIHAR, लद्दाख के कृषि विभाग या Sher-e-Kashmir University of Agricultural Sciences and Technology (SKUAST) से पूछ लें।
  • मिट्टी: यह एक अग्रणी (pioneer) प्रजाति है जो खुली जगह और रेतीली या पथरीली, अच्छे जल निकास वाली मिट्टी पसंद करती है, और कम पोषण वाली जमीन पर भी जी लेती है क्योंकि इसकी जड़ों में नाइट्रोजन स्थिर करने वाले बैक्टीरिया रहते हैं। एक सामान्य संदर्भ सबसे अच्छी मिट्टी गहरी, अच्छे जल निकास वाली रेतीली दोमट, जैविक पदार्थ के साथ और pH 6.5 से 7.5 बताता है।

पौधे की बनावट और रोपण सामग्री

  • नर और मादा पौधे: यह प्रजाति द्विलिंगी (dioecious) है, और सिर्फ मादा पौधों पर बेरी लगती है। परागण हवा से होता है, इसलिए नर पौधे मादा के पास होने चाहिए, एक संदर्भ के अनुसार करीब 100 मीटर के भीतर।
  • अनुपात: Genes पत्रिका की 2023 की एक समीक्षा के अनुसार संभाले हुए बागों में आमतौर पर करीब 10% नर पौधे रखे जाते हैं (दस मादा पर एक नर)। फूल आने तक नर और मादा पहचाने नहीं जा सकते, इसलिए जिन पौधों का लिंग पता हो वही लें या जाने-पहचाने पौधों की कलमों से तैयार पौधे लें।
  • प्रवर्धन: बीज और जड़ से निकले कल्लों (root suckers) से, या किसी खास चयन को बनाए रखने के लिए कलमों से। बीज से उगे पौधों में नर और मादा मिले-जुले आते हैं।
  • किस्में: Hippophae rhamnoides की भारत में जारी किसी किस्म की पुष्टि नहीं हो सकी। यूरोप और चीन के चयन बड़ी बेरी और कम कांटों के लिए तैयार किए गए हैं; भारत के ठंडे रेगिस्तानों में उनका प्रदर्शन यहां दर्ज नहीं है।
  • दूरी: साहित्य में बाग का एक मानक नक्शा कतार में 1 मीटर और कतारों के बीच 4 मीटर है, कतारें रोशनी के लिए उत्तर-दक्षिण दिशा में। इससे प्रति हेक्टेयर करीब 2,500 पौधे (प्रति एकड़ करीब 1,000) आते हैं। यह समशीतोष्ण बागों का नक्शा है, भारत की सिफारिश नहीं, और गरीब, सूखी जमीन पर ज्यादा दूरी जरूरी हो सकती है।

देखभाल, कीट और तुड़ाई

  • देखभाल: एक बार जमने के बाद पौधे को कम चीजें चाहिए, लेकिन सूखी जमीन पर नए बाग को जड़ पकड़ने तक सिंचाई चाहिए। छोटे पौधों को चरने वाले जानवरों से बचाएं।
  • कीट: मात्रा के साथ भारत की कोई कीट या रोग सिफारिश नहीं मिल सकी; सामान्य सलाह पर छिड़काव करने के बजाय अपने KVK या शोध केंद्र से पूछें।
  • उपज, विदेशी आंकड़े: एक सामान्य संदर्भ जमे हुए बाग के लिए करीब 10 टन बेरी प्रति हेक्टेयर और प्रति फलदार पौधा 7 किलो तक बताता है। Genes की समीक्षा mongolica उप-प्रजाति की किस्मों के लिए प्रति पौधा 5 से 12 किलो बताती है, और चीन के कुछ चयन 10,000 से 20,000 किलो प्रति हेक्टेयर तक पहुंचे हैं। इनमें से कुछ भी भारत का आंकड़ा नहीं है, और लद्दाख के जंगली झुरमुट इससे बहुत कम देंगे।
  • तुड़ाई की मजदूरी: बेरी कांटेदार टहनियों से चिपकी रहती है और एशिया में हाथ से तुड़ाई में प्रति हेक्टेयर करीब 1,500 व्यक्ति-घंटे (प्रति एकड़ करीब 600) लगते हैं। दूसरी जगह टहनियां काटने और जमी हुई टहनियों से तुड़ाई के तरीके चलते हैं, और लापरवाही से करने पर दोनों झाड़ी को नुकसान पहुंचाते हैं।
💡 सुझाव: एक एकड़ लगाने से पहले DIHAR, लद्दाख के कृषि विभाग या स्थानीय प्रोसेसिंग यूनिट से पूछें कि आपकी बेरी कौन खरीदेगा, किस रूप में (ताजी, जमी हुई, पल्प) और लिखित में किस भाव पर। असली कमी बाजार की है, पौधे की नहीं।

उत्पाद, बाजार और कमाई

  • DIHAR ने क्या बनाया है: एक DRDO समीक्षा सीबकथॉर्न फल से बना मल्टीविटामिन हर्बल पेय बताती है जो शून्य से नीचे तापमान पर नहीं जमता और सियाचिन इलाके में सैनिकों को दिया गया है, साथ ही सीबकथॉर्न बीज के तेल का सॉफ्ट जेल कैप्सूल, एक हर्बल चाय और बीज के तेल वाला जोड़ों की देखभाल का जेल।
  • कौन खरीदता है: मांग जूस और पेय बनाने वाली इकाइयों, हर्बल और सप्लीमेंट बनाने वालों और सौंदर्य प्रसाधन कंपनियों से आती है। बेरी का भारत में प्रति किलो मौजूदा खरीद भाव पुष्ट नहीं हो सका, इसलिए यहां कोई buy-back आंकड़ा नहीं दिया गया है।
  • कमाई: भारत के पुष्ट भाव और लागत के बिना कोई मुनाफे का आंकड़ा गढ़ा हुआ होगा। ईमानदारी से सिर्फ इतना हिसाब बनता है कि 10 टन/हेक्टेयर यानी प्रति एकड़ 4 टन ताजी बेरी, और आमदनी वह वजन गुणा वह भाव है जिस पर खरीदार लिखित में राजी हो, घटाकर प्रति एकड़ करीब 600 व्यक्ति-घंटे की तुड़ाई।
  • सब्सिडी: सीबकथॉर्न के लिए MIDH या NMPB की मौजूदा सब्सिडी दर की पुष्टि नहीं हो सकी। subsidy finder देखें और लद्दाख के बागवानी दफ्तर से पूछें।
  • मिलकर बेचना: दूर-दराज की घाटियों में FPO से जुड़ने पर जमाने, ढुलाई और प्रोसेसिंग का खर्च बंट जाता है।

स्रोत