खाने की बांस कोपल भारत में उगाई जा सकती है, लेकिन यह लंबे इंतजार वाली खास बाजार की फसल है: साफ बाजार पूर्वोत्तर में है, जहां कोपल रोज के खाने में आती है, और दूसरी जगह उगाने वाले को रोपाई से पहले किसी प्रोसेसर या अचार बनाने वाले से बात पक्की करनी चाहिए। कोपल जल्दी खराब होती है, सिर्फ बरसात में मिलती है, और पौधों को जमने में कई साल लगते हैं।
बाजार में साफ कमी प्रसंस्कृत उत्पादों की है: एक हालिया समीक्षा में 2014 के व्यापार आंकड़े के अनुसार भारत का बांस कोपल आयात US$131.13 million और निर्यात US$8.95 million था। ताजी कोपल का कोई जांचा हुआ भारतीय खेत का भाव प्रति किलो नहीं मिला, इसलिए नीचे उपज और खेती की जानकारी है, और यह बताया गया है कि रोपाई से पहले भाव कैसे परखें।
यह कहां उगती है और कौन सी प्रजातियां
- पूर्वोत्तर भारत: बांस कोपल की सालाना खपत मणिपुर में करीब 2,188 टन, अरुणाचल प्रदेश में 1,997 टन, मेघालय और नागालैंड में 442 टन-442 टन, मिजोरम में 433 टन और त्रिपुरा में 201 टन बताई गई है। इसमें से ज्यादातर कोपल प्राकृतिक झुरमुटों से इकट्ठा की जाती है।
- इस्तेमाल होने वाली प्रजातियां: Dendrocalamus hamiltonii (मेघालय, मिजोरम, सिक्किम), Melocanna baccifera (पूर्वोत्तर), और पूरे देश में Bambusa balcooa, Dendrocalamus asper, Bambusa vulgaris और Dendrocalamus strictus।
- मीठा बांस (Dendrocalamus asper): लगाई जाने वाली कोपल की बाड़ियों के लिए सबसे ज्यादा बढ़ावा पाने वाली प्रजाति। केरल (अलुवा, पलक्कड़), कर्नाटक (थित्तिमत्ती, कोडागु) और पश्चिम बंगाल (पश्चिम मेदिनीपुर) में tissue culture के पौधों के ट्रायल हुए।
- जलवायु और मिट्टी: अच्छी मानसूनी बारिश वाला गर्म, नम इलाका और गहरी, उपजाऊ, अच्छे जल निकास वाली, जैविक पदार्थ से भरपूर मिट्टी। कोपल का आकार नम जगहों पर अर्ध-शुष्क जगहों से कहीं बेहतर रहा (नीचे उपज देखें)।
रोपाई
- पौधे: किसी मान्यता प्राप्त लैब या वन अनुसंधान संस्थान की नर्सरी से Dendrocalamus asper के tissue culture के पौधे। पश्चिम बंगाल के ट्रायल में नर्सरी में 180 दिन सख्त किए गए पौधों में रोपाई के बाद मौतें लगभग शून्य रहीं, जबकि 90 दिन के पौधों में 25% मर गए, और चार साल बाद कुल बचाव करीब 85% रहा।
- गड्ढे: 0.5 x 0.5 x 0.5 मीटर, प्रति गड्ढा 10 किलो गोबर की खाद (पश्चिम बंगाल का ट्रायल)। बारिश की शुरुआत में लगाएं।
- दूरी: केरल और कर्नाटक के IWST ट्रायल में 5 x 5 मीटर रखी गई, यानी प्रति हेक्टेयर 400 झुरमुट या प्रति एकड़ करीब 160। कर्नाटक में D. asper के लिए 5 x 7 मीटर और 5 x 9 मीटर की चौड़ी दूरियां भी आजमाई गई हैं।
- खाद और सिंचाई: भारतीय हालात के लिए कोपल की बाड़ी की कोई जांची हुई खुराक नहीं मिली। अपने राज्य के वन या बागवानी अनुसंधान केंद्र और KVK से पूछें, और कोपल के मौसम में झुरमुट को नम रखें।
- कीट और रोग: मौजूदा सिफारिश KVK से पूछें; कोपल की बाड़ी के लिए कोई जांची हुई सिफारिश नहीं मिली।
कोपल की उपज
| जगह | झुरमुट की उम्र | प्रति झुरमुट कोपल | कोपल का आकार |
|---|---|---|---|
| होसाकोटे, बेंगलुरु (अर्ध-शुष्क) | 5 साल | करीब 16 | व्यास 18 मिमी, खाने लायक हिस्सा 0.75 किलो से ऊपर |
| थित्तिमत्ती, कोडागु (नम उष्णकटिबंधीय) | 5 साल | करीब 25 | व्यास 55 मिमी, खाने लायक हिस्सा 2 किलो से ऊपर |
| अराबारी, पश्चिम मेदिनीपुर (पश्चिम बंगाल) | 4 साल | प्रति झुरमुट 25 डंडे | डंडे की ऊंचाई 4.5 मीटर (यह डंडों का ट्रायल है, कोपल की कटाई नहीं) |
- एक ही प्रजाति ने सूखी और नम जगहों में बहुत अलग उपज दी, इसलिए किसी भी औसत आंकड़े से ज्यादा जगह मायने रखती है।
- हर कोपल जवान अवस्था में काटें: Dendrocalamus asper में निकलने के 10 से 14 दिन बाद, Dendrocalamus strictus में 6 से 10 दिन और Bambusa tulda में 10 से 16 दिन बाद। कोपल का मौसम जून के पहले हफ्ते से सितंबर के पहले हफ्ते तक है।
- पर्याप्त कोपलें डंडे बनने के लिए छोड़ें, वरना झुरमुट कमजोर पड़ जाता है। कोपलों का एक हिस्सा ही काटें, और कितना, यह वन अनुसंधान संस्थान से पूछें।
प्रसंस्करण और सुरक्षा
- कच्ची बांस कोपल में cyanogenic glycosides होते हैं। समीक्षा के अनुसार कोपल की नोक में 120 मिग्रा प्रति किलो, बीच में 12 मिग्रा प्रति किलो और जड़ की ओर 1.1 मिग्रा प्रति किलो है, जबकि सूखे वजन में सुरक्षित सीमा 10 मिग्रा HCN के बराबर प्रति किलो है।
- कम से कम 15 मिनट उबालने से साइनाइड की मात्रा घटती है, जांची गई पढ़ाइयों में 91% तक। कोपल को कभी कच्चा न बेचें, न खाएं।
- आम उत्पाद हैं: किण्वित कोपल, अचार, डिब्बाबंद और सूखी कोपल। धूप में सुखाई किण्वित कोपल में कच्चा रेशा (10.76% ज्यादा) और प्रोटीन (15.20% ज्यादा) बढ़ा।
- पैक किए खाद्य उत्पाद के लिए FSSAI पंजीकरण या लाइसेंस चाहिए; छोटी इकाई जिला उद्योग केंद्र या राज्य खाद्य सुरक्षा कार्यालय से पूछे।
लागत और कमाई
- 5 साल पुराने Dendrocalamus asper बागानों के एक मॉडल में, जिसमें सिर्फ कोपल की उपज गिनी गई, 10% छूट दर पर लाभ-लागत अनुपात 6.21 आया। यह माने हुए उपज और भाव पर टिका है और खराब जगहों का नुकसान इसमें नहीं है, इसलिए इसे ऊपरी निशान मानें।
- ताजी या प्रसंस्कृत कोपल का कोई जांचा हुआ भारतीय भाव प्रति किलो नहीं मिला, और पहली कटाइयां छोटी होती हैं। सही जांच यह है कि प्रति झुरमुट खाने लायक कोपल की अपनी उपज को प्रति एकड़ 160 झुरमुट से गुणा करें, और अपने असली खरीदार के बताए भाव से गुणा करें, छीलने और छांटने में जाने वाले हिस्से को घटाकर।
- बागान की आय बाद में डंडों (बल्लियां, लुगदी) पर भी निर्भर करती है क्योंकि एक ही झुरमुट दोनों देता है, पर कोपल की कटाई और डंडों की कटाई आपस में टकराती हैं।
बाजार और जोखिम
- समीक्षा मुख्य रुकावटें गिनाती है: जंगल से कटाई के नियम, कम कोल्ड चेन, और ताजी कोपल की अनिश्चित मांग। ताजी कोपल देर तक नहीं टिकती, इसलिए कटाई के एक दिन के भीतर प्रसंस्करण की योजना बनाएं।
- खरीदार पूर्वोत्तर की स्थानीय सब्जी मंडियां, किण्वित कोपल और अचार बनाने वाले और दूसरी जगह खास खाद्य और रेस्तरां के खरीदार हैं। रोपाई से पहले अपने जिले में मांग जांच लें।
- National Bamboo Mission राज्य बांस मिशनों के जरिए बागानों और प्राथमिक प्रसंस्करण में मदद करता है। मौजूदा दरें राज्य के बागवानी या वन विभाग से पूछें, और subsidy finder देखें। संबंधित गाइड: commercial bamboo। FPO के जरिए समूह में बिक्री छोटे उत्पादक के काम आती है।
स्रोत
- Edible bamboo shoots: a sustainable nexus of nutrition, livelihood, and food security for rural communities in India (PMC)
- A two step method for accelerated mass propagation of Dendrocalamus asper and their evaluation in field (PMC)
- Introduction, mass multiplication and establishment of edible bamboo Dendrocalamus asper in India (Indian Journal of Plant Genetic Resources)
