हॉप्स भारत के ज्यादातर हिस्सों में सामान्य खेती की फसल के रूप में नहीं चलते। व्यावसायिक रूप से ये सिर्फ हिमाचल प्रदेश की ठंडी, ऊंचाई वाली जनजातीय पट्टी (लाहौल एवं स्पीति का लाहौल और चंबा का पांगी) में उगाए गए हैं, और वहां भी सस्ते आयातित हॉप्स और पेलेट के ब्रुअरियों में छा जाने पर उत्पादन ढह गया। कहीं और हॉप्स लगाने का मतलब है बिना परखी फसल, घर से ऊंचा ट्रेलिस और कोई पक्का खरीदार नहीं।
हॉप शूट्स की "दुनिया की सबसे महंगी सब्जी" वाली कहानियां कोई कारोबारी योजना नहीं हैं: 2021 का बिहार का एक खूब फैला मामला ऐसा है जिसमें संपादक की टिप्पणी है कि बाद की जांच में खेत में फसल नहीं मिली। हॉप शूट्स के लिए भारत की कोई भाव सूची, लागत पत्रक या खरीदार पुष्ट नहीं हो सका।
भारत में यह कहां उगाए गए हैं
- हिमाचल प्रदेश: 1998 की Tribune की एक रिपोर्ट के अनुसार हॉप्स व्यावसायिक रूप से सिर्फ लाहौल (लाहौल एवं स्पीति जिला) और पांगी (चंबा जिला) में उगाए जाते थे। 1995 में खेती का क्षेत्र 215 हेक्टेयर था, और उत्पादन 1994 के 130 टन से घटकर 1997 में 35 टन रह गया।
- गिरावट क्यों आई: वही रिपोर्ट आयात शुल्क 120% से घटकर 40% होने को दोषी ठहराती है, जिससे ब्रुअरियां आयातित हॉप्स, एक्सट्रैक्ट और पेलेट की ओर चली गईं, और राज्य में पेलेट और एक्सट्रैक्ट की प्रोसेसिंग न होने को भी। CSIR जम्मू ने हिमाचल के हॉप्स को अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता के बराबर बताया था, यानी नाकामी खेती की नहीं, कारोबार की थी।
- जलवायु की जरूरत: हॉप्स को सर्दी में ठंडी सुप्तावस्था चाहिए। रिपोर्टों में पाले के करीब तापमान के 5 से 6 हफ्ते, बर्फ या मिट्टी के ढकाव में जड़ों का करीब माइनस 25°C तक बचे रहना, मार्च में अंकुरण, और करीब 35° अक्षांश के उत्तर या दक्षिण में व्यावसायिक हॉप इलाके बताए गए हैं। लाहौल 35°N से नीचे है लेकिन ऊंची, ठंडी, सूखी घाटी है। जहां सर्दी की असली ठंडक नहीं होती, वहां यह फसल ठीक बैठने की संभावना कम है।
- मिट्टी: गहरी, अच्छे जल निकास वाली मिट्टी, क्योंकि जड़ें 4 मीटर से ज्यादा गहरी और 5 मीटर तक बगल में जाती हैं।
किस्में और रोपण सामग्री
- बीयर बनाने के लिए मादा पौधे लिए जाते हैं; प्रसार प्रकंद (rhizome) या कलमों से होता है, बीज से नहीं। Michigan SARE की एक परियोजना में Cascade इस्तेमाल हुई, जो अमेरिका की आम craft brewing किस्म है, लेकिन नाम वाली किस्मों और alpha-acid नतीजों वाला कोई भारतीय किस्म ट्रायल नहीं मिला।
- Oregon State University Crystal, Comet, Lotus और Pahto को पाउडरी मिल्ड्यू के प्रति कम संवेदनशील किस्में बताती है। भारत की स्थितियों में इनमें से कोई चलेगी या नहीं, यह परखा नहीं गया है।
- विदेश से रोपण सामग्री (rhizome) मंगाने के लिए पौध संगरोध की अनुमति चाहिए; कुछ भी मंगाने से पहले National Bureau of Plant Genetic Resources और अपने राज्य के बागवानी विभाग से पूछें। प्रेस रिपोर्टों के अनुसार ऊपर के बिहार वाले मामले में पौध ICAR-IIVR वाराणसी से ली गई थी।
ट्रेलिस, दूरी और रोपाई
- मानक व्यावसायिक हॉप बाग में करीब 18 फुट (5.5 मीटर) ऊंचा ट्रेलिस और पौधे करीब 3 फुट x 14 फुट की दूरी पर होते हैं, यानी प्रति एकड़ 1,000 से 1,200 पौधे (Michigan State University Extension)।
- Michigan SARE के छोटे ट्रेलिस ट्रायल में 10 फुट (3 मीटर) के खंभे, 10 फुट की कतारें और 36 इंच (0.9 मीटर) की पौधा दूरी रखी गई, और ऊंचे विकल्प के $45 के मुकाबले खंभे $18 प्रति नग के बताए गए।
- खंभे और तार रोपाई से पहले लगाने होते हैं। ट्रेलिस सबसे बड़ा स्थायी खर्च है; खंभों, एंकर और तार के कोटेशन लेकर ही फैसला करें।
खाद, सिंचाई और रोग
- Oregon State की सलाह है कि अच्छी तरह संभाले गए हॉप्स के लिए प्रति एकड़ 200 पाउंड से कम नाइट्रोजन (प्रति हेक्टेयर करीब 225 किलो) आमतौर पर काफी है, और ज्यादा नाइट्रोजन से मौसम के आखिर में रोग बढ़ता है। हॉप्स के लिए भारत की कोई खाद सारणी नहीं मिली।
- पाउडरी मिल्ड्यू और डाउनी मिल्ड्यू पूरी फसल बिगाड़ सकते हैं। सर्दी के पुराने पौध अवशेष हटाएं, वसंत में दो बार छंटाई करें, हर पौधे पर कम शाखाएं चढ़ाएं, निचली पत्तियां हटाएं और नमी घटाने के लिए सिंचाई संभालें। जहां मिलें, रोग सहने वाली किस्में लगाएं। फफूंदनाशक और मात्रा लेबल और स्थानीय पौध संरक्षण की सलाह से तय करें।
- नम मौसम में हॉप्स ऊंचे और घने बढ़ते हैं, इसलिए अच्छे जल निकास और हवा वाली जगह चुनें और छतरी खुली रखें।
कटाई और उपज
- पहले साल की उपज कम होती है। Michigan के एक ट्रायल में ट्रायल रोपण से पहले साल 8 पाउंड सूखे और दूसरे साल 44 पाउंड सूखे मिले, और पूरा बाग तीसरे साल से प्रति पौधा करीब 1 पाउंड सूखे, यानी करीब 1,000 पाउंड प्रति एकड़ (करीब 450 किलो प्रति एकड़, 1,100 किलो प्रति हेक्टेयर) तक पहुंचने की उम्मीद है।
- शंकु (cones) गर्मी के आखिर में तोड़े जाते हैं, जल्दी सुखाने पड़ते हैं और फिर गांठों में दबाए या पेलेट बनाए जाते हैं। सुखाने और पेलेट बनाने के उपकरण छोटे खेत के लिए महंगे हैं; हिमाचल का मामला दिखाता है कि प्रोसेसिंग का न होना उद्योग के फेल होने का एक कारण था।
- प्रति एकड़ शंकु की कोई ताजा भारतीय उपज नहीं मिली। अमेरिकी आंकड़ों को ऊपरी सीमा मानें, पूर्वानुमान नहीं।
लागत और कमाई
- ब्रुइंग हॉप्स की भारतीय खेती लागत या खेत पर बिक्री भाव पुष्ट नहीं हो सका। इसलिए भारतीय हॉप्स के लिए "प्रति एकड़ मुनाफे" का कोई भी आंकड़ा बिना आधार का है, और यहां कोई नहीं दिया गया है।
- पैमाने का उदाहरण (भारतीय आंकड़ा नहीं): अगर पूरा बाग प्रति एकड़ करीब 450 किलो सूखे शंकु देता है, तो खेत पर बिक्री के हर ₹100 प्रति किलो भाव का मतलब है प्रति एकड़ ₹45,000। इसकी तुलना पूरे एकड़ पर 18 फुट ट्रेलिस, सुखाने के उपकरण और 3 साल के इंतजार की लागत से करें।
- हॉप शूट्स: एक प्रेस रिपोर्ट ₹85,000 प्रति किलो बताती है, और एक दूसरे किसान ने प्रति कट्ठा ₹50 से 60 लाख का दावा किया। किसी भी दावे के पीछे नाम वाला खरीदार नहीं था, और Outlook की कहानी पर संपादक की टिप्पणी कहती है कि बाद की पूछताछ में फसल नहीं मिली। इन आंकड़ों पर योजना न बनाएं।
बाजार और जोखिम
- खरीदार ब्रुअरियां हैं। 1998 की रिपोर्ट कहती है कि ब्रुअरियां आयातित हॉप्स, एक्सट्रैक्ट और पेलेट की ओर चली गईं, इसलिए उत्पादक को भाव और एकरूपता में आयात से मुकाबला करना पड़ता है; मौजूदा ब्रुअरियों से पूछें कि वे अब क्या आयात करती हैं और क्या खरीदती हैं।
- 1998 की रिपोर्ट हिमाचल की गिरावट को आयात शुल्क की कटौती से जोड़ती है, इसलिए शुल्क में बदलाव फिर तय कर सकता है कि फसल से फायदा होगा या नहीं।
- मुख्य जोखिम: खरीदार न होना, प्रोसेसिंग न होना, मानसून का रोग, ट्रेलिस की ऊंची लागत, और रोपण सामग्री बेचने वालों के कमाई के वादे। खरीदार पक्का होने से पहले rhizome न खरीदें।
- पहाड़ी किसान समूह में बिक्री के लिए subsidy finder और FPO भी देखें; हॉप्स के लिए किसी अलग सब्सिडी दर की पुष्टि नहीं हो सकी।
स्रोत
- The Tribune, hops cultivation in Himachal Pradesh (1998)
- Outlook India, Can this Bihar farmer grow the world's costliest vegetable (2021, with editor's note)
- SARE, short trellis system for Cascade hops in Michigan
- Michigan State University Extension, hop production in Michigan
- Oregon State University Extension, managing powdery mildew in hop
- Krishi Jagran, hop shoots cultivation (secondary source)
- Tractor Junction, hop shoots farming in India (secondary source, price claims unverified)
