पान का पत्ता भारत की पुरानी और आजमाई हुई फसल है, जो पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार, असम, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र में उगती है। पर इसे वही शुरू करे जिसके पास सिंचाई का पानी, घर की मजदूरी, बरोज (छायादार ढांचा) और रोज खरीदने वाला व्यापारी हो। यह रोज के काम वाली फसल है, जिसमें पहले साल घाटा होता है, चलाने का खर्च ऊंचा है और एक रोग पूरी बेलें खत्म कर सकता है।
ICAR में छपे एक शोध पत्र के अनुसार भारत में 15 से 20 मिलियन लोग रोज पान खाते हैं और फसल करीब 55,000 हेक्टेयर में है। नीचे का हिसाब सुंदरबन के एक अध्ययन का है, इसलिए अपने राज्य की मजदूरी और भाव के हिसाब से बदलें।
यह कहां उगता है और इसे क्या चाहिए
- जलवायु: छनी हुई छांव में ठंडी, नम परिस्थिति और नियमित नमी। कोमल पत्ते गर्म सूखी हवा, पाले और तेज बारिश से खराब होते हैं, इसीलिए फसल छत और दीवार वाले बरोज के अंदर उगाई जाती है।
- मिट्टी: TNAU अच्छे जल निकास वाली उपजाऊ चिकनी दोमट की सलाह देता है। खारी और क्षारीय मिट्टी ठीक नहीं। सुंदरबन के अध्ययन में हर उत्पादक ने जलभराव से बचने के लिए ऊंची जमीन ली और 100% सिंचित खेती की, ज्यादातर अपने तालाब से पंप सेट के जरिए।
- ढांचा: पश्चिम बंगाल में बरोज बांस, जूट की डंडियों और घास या पुआल से बनता है। तमिलनाडु में TNAU जीवित सहारे बताता है: करीब 4 मीटर ऊंचे अगाथी के पेड़ और क्यारियों के किनारे केले के चूसक। विकल्प बांस के खंभे हैं।
किस्में
| किस्म | स्रोत | खासियत | कहां के लिए ठीक |
|---|---|---|---|
| SGM 1 | TNAU की सूची में, 1994 में जारी | बौनी; प्रति हेक्टेयर साल में 65 लाख पत्ते | तमिलनाडु और मिलती-जुलती परिस्थितियां |
| SGM BV 2 | TNAU की सूची में, 2004 में जारी | गहरे हरे पत्ते; प्रति हेक्टेयर साल में 48.81 लाख पत्ते | तमिलनाडु और मिलती-जुलती परिस्थितियां |
| Meetha | पश्चिम बंगाल की पारंपरिक किस्म | सुंदरबन के अध्ययन में करीब 96% उत्पादक इसे उगाते थे | पश्चिम बंगाल |
| Bangla, Desawari, Kapoori, Sanchi | पारंपरिक किस्में | Bangla और Desawari उत्तर में, Kapoori प्रायद्वीपीय राज्यों में; स्थानीय बाजार के स्वाद से चुनें | अपने खरीदार से पूछें |
| DPB-6, Bidhan Pan | TNAU की सूची में | दूसरे विकल्प | KVK से पूछें |
पान के खरीदार पत्ते की किस्म पर बहुत अड़े रहते हैं, इसलिए वही किस्म लगाएं जो आपके स्थानीय बाजार को पहले से पसंद हो।
रोपाई
- मौसम: नवंबर से दिसंबर और जनवरी से फरवरी।
- सामग्री: स्वस्थ बेलों के ऊपरी हिस्से से 30 से 45 सेमी लंबी सिरे की कलमें (setts), जिनमें ताकतवर कली और गांठों की जड़ें हों। TNAU के अनुसार प्रति हेक्टेयर करीब 1,00,000 कलमें लगती हैं (प्रति एकड़ करीब 40,000)।
- दूरी: TNAU: 180 सेमी चौड़ी क्यारियों पर दो कतारें, पौधों के बीच 45 सेमी।
- सिंचाई: TNAU की सलाह है कि रोपाई के तुरंत बाद और फिर हर हफ्ते सिंचाई करें; सुंदरबन के अध्ययन में उत्पादकों ने साल भर पंप सेट से सिंचाई की।
- बेलों को साधना: हर 15 से 20 दिन में बेलों को सहारे पर चढ़ाएं, और मार्च से अप्रैल में जब बेलें करीब 3 मीटर की हो जाएं तो नई बढ़वार के लिए उन्हें नीचे उतारें।
खाद
| स्रोत | प्रति हेक्टेयर साल में खुराक | प्रति एकड़ |
|---|---|---|
| TNAU | 150 किलो N (75 किलो नीम की खली और 75 किलो यूरिया से), 100 किलो P2O5, 30 किलो K2O, तीन बार में, बेल उतारने के 15 दिन बाद से शुरू करके फिर 40 से 45 दिन के अंतर पर | करीब 61 किलो N, 40 किलो P2O5, 12 किलो K2O |
| पश्चिम बंगाल का ट्रायल (HRS मोंडौरी, किस्म Simurali Deshi) | 200 किलो N, 100 किलो P2O5, 100 किलो K2O, चार-चार महीने के अंतर पर तीन बार में; पत्ते का सबसे अच्छा आकार जैविक और यूरिया नाइट्रोजन के 50:50 मेल पर | करीब 81 किलो N, 40 किलो P2O5, 40 किलो K2O |
ट्रायल में सरसों की खली की नाइट्रोजन को यूरिया के साथ 50:50 मिलाने पर पत्ते सबसे बड़े रहे और अकेली जैविक खाद पर सबसे छोटे। क्योंकि पत्ते ताजे चबाए जाते हैं, जहां हो सके जैविक चीजें इस्तेमाल करें और किसी भी रसायन के लिए लेबल और अपने KVK की सलाह मानें।
कीट और रोग
- पाद गलन और पत्ती गलन (Phytophthora): 5 से 90% तक नुकसान बताया गया है। TNAU महीने में एक बार Bordeaux mixture 0.25% की जड़ों में सिंचाई और जीवाणु की समस्या के लिए 20 दिन के अंतर पर Streptocycline के साथ Bordeaux mixture सुझाता है। पश्चिम बंगाल के ट्रायल में Bordeaux mixture 1% का छिड़काव हर महीने हुआ। अच्छा जल निकास और साफ कलमें पहली सुरक्षा हैं।
- रस चूसने वाले कीट: सफेद मक्खी, माहू, थ्रिप्स और दूसरे पत्ते पर हमला करते हैं। केरल के कोल्लम की एक रिपोर्ट में जांचे गए 66% पौधों पर चाय का मच्छर कीट मिला; नीम तेल और साबुन का 0.2% घोल हर तीसरे दिन दो हफ्ते छिड़कने से प्रकोप दो और छह महीने बाद घटकर 10% और 4% रह गया।
- दूसरे: TNAU शल्क कीट, माइट, मीली बग, सूत्रकृमि, एन्थ्रेक्नोज और चूर्णिल आसिता गिनाता है, जिनमें चूर्णिल आसिता के लिए wettable sulphur 0.2% और सूत्रकृमि के लिए नीम की खली 1 टन प्रति हेक्टेयर है। क्योंकि पत्ते खाए जाते हैं, किसी भी रसायन के छिड़काव से पहले अपने KVK से पूछ लें।
कटाई और उपज
- बेलें बड़ी हो जाने पर पत्ते लगभग रोज तोड़े जाते हैं; पहले साल बहुत कम मिलता है। पश्चिम बंगाल में पत्ते 10,000 की "मोट" में गिने जाते हैं।
- TNAU प्रति हेक्टेयर साल में 75 से 100 लाख पत्ते बताता है। सुंदरबन के खेतों में 0.05 हेक्टेयर से औसतन 29.09 मोट (करीब 2.9 लाख पत्ते) मिले, जो प्रति हेक्टेयर करीब 58 लाख बैठता है।
- पत्तों को गीले कपड़े, पुआल या केले के पत्ते के साथ टोकरियों में इस तरह पैक करें कि वे मंडी तक पहुंचते हुए सूखें या दबें नहीं।
लागत और कमाई
- सुंदरबन का अध्ययन (0.05 हेक्टेयर, करीब 500 m2, एक बरोज; पत्र 2015 में प्राप्त): सालाना चलाने का खर्च ₹98,663 (जमीन तैयारी ₹11,350, खाद ₹32,242, पैकिंग ₹10,870, मरम्मत ₹9,300, जूट की डंडियां ₹7,398, कटाई ₹5,609, ढुलाई ₹4,661, कीटनाशक ₹5,449, सिंचाई ₹2,419) और ₹7,893 ब्याज। कुल आय ₹1,74,561, 29.09 मोट से करीब ₹6,000 प्रति मोट (₹60 प्रति 100 पत्ते) पर। एक आम साल में शुद्ध आय ₹68,005।
- पहला साल: अध्ययन के नकदी प्रवाह में बरोज बनने वाले साल में ₹1,42,295 का शुद्ध घाटा दिखता है, और बाद के सालों में ₹40,000 से ₹81,000 शुद्ध। इसमें 8 साल की उम्र मानी गई, जिसके बाद ढांचे पर बड़ा खर्च चाहिए। लागत वापसी 2.81 साल, IRR 45%, लाभ-लागत अनुपात 1.25।
- बढ़ाने की सावधानी: ये आंकड़े एक 0.05 हेक्टेयर इकाई के हैं जिसे परिवार चलाता है। इन्हें 20 से गुणा करके एक हेक्टेयर बना देना किराए की मजदूरी, बाजार की सीमा और रोग के जोखिम को अनदेखा करता है, इसलिए ऐसा बजट न बनाएं।
- भाव मौसम और त्योहारों की मांग से तेजी से बदलते हैं; अपनी नजदीकी पान मंडी का मौजूदा भाव पूछें, और mandi prices देखें।
बाजार और जोखिम
- पत्ते स्थानीय व्यापारियों और पान मंडियों से जाते हैं, जिनमें बिचौलिए बहुत हैं; सुंदरबन का अध्ययन उतार-चढ़ाव वाले भाव, कई बिचौलियों, ग्रेडिंग और भंडारण की कमी और ढुलाई को रुकावट गिनाता है। एक छोटा निर्यात भी है (पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और मध्य पूर्व समेत देशों को साल में ₹3 से 4 करोड़, केरल वाले पत्र में दिए गए 2012 के एक संदर्भ के अनुसार)।
- मुख्य जोखिम: भारी बारिश के बाद पाद गलन, आंधी से बरोज को नुकसान, भाव गिरना और रोज की मजदूरी।
- कार्यशील पूंजी के लिए Kisan Credit Card, मदद के लिए subsidy finder (कुछ राज्यों में बरोज या पौध संरक्षण की योजनाएं हैं; बागवानी विभाग से पुष्टि करें) और समूह में बिक्री के लिए FPO देखें।
स्रोत
- TNAU Agritech Portal, Betelvine
- Mandal and Mandal, Financial feasibility and constraints of betel vine cultivation in coastal Sundarbans, West Bengal (Journal of Indian Society of Coastal Agricultural Research)
- Pariari and Imam, Leaf characters of betelvine as influenced by nitrogen application (Indian Journal of Horticulture 69(4), 2012)
- Sivakumar and Yeshwanth, Helopeltis theivora as a pest of betel vine (Indian Journal of Agricultural Sciences 90(2), 2020)
