केसर (kesar, Crocus sativus) ठंडे, गर्मियों में सूखे रहने वाले, अच्छी जल निकासी वाले ऊंचे इलाकों की मिट्टी की फसल है, और भारत में इसकी कारोबारी खेती लगभग सिर्फ जम्मू और कश्मीर (पुलवामा का पंपोर, बडगाम, श्रीनगर और किश्तवाड़) में होती है। कश्मीर के बाहर यह अभी ट्रायल के चरण में है: CSIR-IHBT ने इसे हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और लद्दाख में आजमाया है, और कहा है कि किसी इलाके को ठीक घोषित करने से पहले वह लगातार तीन सफल फसलें चाहता है। मैदान के किसान, गर्म नम जिले या शहर में रहने वाले के लिए केसर खेत की व्यावहारिक फसल नहीं है, चाहे घर के अंदर की "किट" का कितना भी प्रचार हो।
प्रति क्षेत्र उपज बहुत कम है (प्रति हेक्टेयर कुछ किलो सूखा मसाला), इसलिए मुनाफा प्रति किलो के बहुत ऊंचे भाव से और मजदूरी वाली कटाई को संभालने से आता है। मुख्य जोखिम कंद सड़न, मौसम का उतार-चढ़ाव और खराब रोपण सामग्री खरीदना हैं।
कहां उगता है, और आंकड़े
- पंपोर का करेवा पठार (समुद्र तल से करीब 1,585 से 1,677 मीटर ऊपर) इसका गढ़ है; केसर की व्यापक मिट्टी करीब 1,600 से 2,100 मीटर पर है। करेवा की मिट्टी में पानी अच्छी तरह निकल जाता है, जिससे कंद सड़न रुकती है। यहां केसर ज्यादातर बारानी है।
- 2025 की रिपोर्टें कश्मीर में करीब 3,665 हेक्टेयर बताती हैं, जिसमें पंपोर करीब 3,200 हेक्टेयर, बडगाम करीब 300 हेक्टेयर और श्रीनगर करीब 165 हेक्टेयर है। एक PIB बयान के अनुसार क्षेत्र करीब 5,700 हेक्टेयर से घटकर करीब 3,800 हेक्टेयर रह गया है और उत्पादकता 3.13 से घटकर 2.50 किलो प्रति हेक्टेयर हो गई है। अलग-अलग सरकारी बयान उत्पादन और उपज के अलग आंकड़े देते हैं, इसलिए इन्हें अनुमानित मानें।
- राष्ट्रीय केसर मिशन 2010 में शुरू हुआ (₹371.18 करोड़, जिसमें ₹286.06 करोड़ केंद्र का हिस्सा और ₹85.12 करोड़ किसानों का हिस्सा था, PIB के अनुसार) ताकि कंद, सिंचाई और विपणन को नया जीवन मिले। कश्मीर केसर को 2020 में GI टैग मिला।
- कश्मीर के बाहर के ट्रायल: CSIR-IHBT के 2018 से 2020 के ट्रायल हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में छह जगह (किन्नौर, भरमौर, पालमपुर, बागेश्वर) हुए। लाहौल-स्पीति और सेराज घाटी पायलट इलाके हैं। ये पायलट हैं, कोई स्थापित उद्योग नहीं।
जलवायु और मिट्टी
केसर को भुरभुरी, ढीली, अच्छी जल निकासी वाली चूनेदार चिकनी या दोमट मिट्टी चाहिए, जिसमें जैविक पदार्थ अच्छा हो और pH 6 से 8 हो (थोड़ी क्षारीय ज्यादा पसंद)। इसे ठंडी सर्दियां और गर्मियों में सूखा आराम का दौर चाहिए, और फूल अक्टूबर से मध्य नवंबर में आते हैं। सुप्त कंद के मौसम में पानी भर जाना असफलता की सबसे आम वजह है।
रोपण सामग्री और किस्म
SKUAST-Kashmir ने Shalimar Saffron-1 जारी की है। इसकी खेती की सिफारिशों में प्रति हेक्टेयर कंद की ये मात्राएं दी गई हैं:
| प्रणाली | लक्षित संख्या | कंद चाहिए | ज्यामिति |
|---|---|---|---|
| सामान्य घनत्व | 5 लाख प्रति हेक्टेयर | करीब 50 क्विंटल मिश्रित ग्रेड | 20 x 10 सेमी, 15 सेमी गहरा, हर थाले में 1 कंद; या 25 x 15 सेमी पर 2 कंद |
| ज्यादा घनत्व | 12 लाख प्रति हेक्टेयर | करीब 86.4 क्विंटल (8 ग्राम से ऊपर के कंद 57.6 क्विंटल, 5 से 8 ग्राम के 28.8 क्विंटल) | नालियां 25 x 15 सेमी की दूरी पर, हर नाली में 5 कंद |
प्रति एकड़ यह सामान्य घनत्व पर करीब 20 क्विंटल कंद और ज्यादा घनत्व पर करीब 35 क्विंटल है। उत्पादकों द्वारा बताया गया कश्मीर का एक और पारंपरिक तरीका अगस्त में 1.5 से 2 मीटर चौड़ी उठी क्यारियों पर लगाना है। रोपाई फूल आने से पहले, जुलाई से अगस्त में सबसे अच्छी है। बड़े कंद (8 ग्राम से ऊपर) ज्यादा फूलते हैं, इसीलिए गिनती से ज्यादा कंद का ग्रेड मायने रखता है।
रोपण सामग्री सबसे बड़ा शुरुआती खर्च है और धोखाधड़ी का मुख्य जोखिम भी। सिर्फ J&K कृषि विभाग, SKUAST-Kashmir या उनके भरोसे के स्रोत से खरीदें; ICAR के शोधकर्ता भी गुणवत्ता वाली रोपण सामग्री की कमी को एक रुकावट बताते हैं।
पोषण, सिंचाई और देखभाल
SKUAST की सिफारिशों से उर्वरक की कोई पुष्ट अनुसूची पढ़ी नहीं जा सकी, इसलिए यहां कोई मात्रा नहीं दी गई है; J&K कृषि विभाग या SKUAST की सलाह मानें। मिशन ने बोरवेल से चलने वाली स्प्रिंकलर प्रणालियां लगाई हैं जो मिट्टी को करीब 6 इंच (कंद वाले हिस्से) तक भिगोती हैं, 10 मीटर x 10 मीटर की दूरी पर 9.3 लीटर प्रति मिनट वाले एमिटर के साथ। देखें स्प्रिंकलर सिंचाई।
कीट और रोग
- कंद सड़न (Fusarium oxysporum मुख्य जीव बताया गया है) सबसे बड़ा रोग जोखिम है और उपज घटने की मुख्य वजह है। हाल के शोध का तर्क है कि अकेले रोगाणु से ज्यादा कंद को चोट लगना मुख्य कारण है, इसलिए कंद को सावधानी से संभालें और पानी निकलने वाली जमीन में लगाएं।
- साही और चूहे कंद खोद देते हैं; उत्पादक रोकने के लिए बाड़ और आइरिस लगाते हैं।
- जलवायु परिवर्तन, बेमौसम बारिश, पंपोर के पास सीमेंट की धूल और मकान बनाने के लिए जमीन का बदलना गिरावट की दूसरी वजह बताई जाती हैं।
कटाई और उपज
फूल अक्टूबर से नवंबर में सुबह हाथ से तोड़े जाते हैं, और वर्तिकाग्र (stigma) उसी दिन अलग करके सुखाए जाते हैं। SKUAST-Kashmir बताता है कि उत्पादकता 2003-04 में 2.5 किलो प्रति हेक्टेयर से बढ़कर हाल के सालों में करीब 5.0 से 5.5 किलो प्रति हेक्टेयर हो गई है (करीब 2 से 2.2 किलो प्रति एकड़)। शोध साहित्य में किसानों द्वारा बताया गया चार साल का चक्र साल 1 में करीब 1.5 किलो प्रति हेक्टेयर दिखाता है, फिर साल 2 से 4 में 5, 7 और 10 किलो प्रति हेक्टेयर। कंद मिट्टी के नीचे बढ़ते हैं, इसलिए स्टॉक को हर कुछ साल में निकालकर दोबारा लगाया जाता है।
लागत और कमाई
इसे मोटा उदाहरण समझें, वादा नहीं। 5 किलो प्रति हेक्टेयर (2 किलो प्रति एकड़) और ₹3 लाख प्रति किलो के भाव पर एक एकड़ से कुल करीब ₹6 लाख मिलेंगे। भाव की मान्यता सबसे कमजोर हिस्सा है: 2025 की एक खबर ने कहा कि सबसे ऊंचे ग्रेड का कश्मीर केसर ₹5 लाख प्रति किलो से ऊपर बिक रहा था, लेकिन खेत के भाव या नीलामी भाव की कोई श्रृंखला पुष्ट नहीं हो सकी, इसलिए खुदरा सुर्खियों वाले भाव इस्तेमाल न करें। कंद की लागत (सामान्य घनत्व पर प्रति एकड़ करीब 20 क्विंटल), तोड़ाई की मजदूरी, स्प्रिंकलर और बाड़ असली खर्च हैं; कंद का कोई पुष्ट भाव नहीं मिला, इसलिए शुद्ध आंकड़ा नहीं दिखाया गया है। प्रति एकड़ 2 किलो पर भाव में 10 प्रतिशत की गिरावट भी बड़ा पूर्ण नुकसान है, और असफल साल की भरपाई नहीं हो सकती।
बाजार और बिक्री
- कश्मीर केसर को GI टैग (2020) मिला है। मिलावट (रंगे रेशे, मक्के के रेशे, कश्मीर के बाहर का या आयातित वर्तिकाग्र जो कश्मीरी बताकर बिके) आम है, और ICAR की समीक्षा इसे एक खतरा बताती है। जहां हो सके GI-प्रमाणित, जांचे हुए माध्यमों से बेचें।
- शहरों में प्रचारित घर के अंदर, एयरोपोनिक या हाइड्रोपोनिक "केसर फार्म" कंद की किट या buy-back सौदे बेचते हैं। ICAR की समीक्षा इन तरीकों को टिकाऊ नहीं मानती क्योंकि ये पारंपरिक इलाकों का कंद स्टॉक खींच लेते हैं, और घर के अंदर की उपज सार्वजनिक ट्रायल डेटा से स्थापित नहीं है जो मिल सका हो। buy-back की शर्तें लिखित में मांगें और ऐसे व्यक्ति का हवाला मांगें जिसने सच में मसाला बेचा हो।
- मंडी भाव देखें, और FPO के जरिए सामूहिक बिक्री पर विचार करें।
सब्सिडी
केसर के लिए सहायता राष्ट्रीय केसर मिशन और J&K कृषि विभाग से आई है। दरें बदलती रहती हैं, और प्रति हेक्टेयर की कोई मौजूदा दर पुष्ट नहीं हुई है, इसलिए विभाग से पक्का कर लें। सब्सिडी खोजें भी देखें।
स्रोत
- AICRP Spices: Package of Practices, Shalimar Saffron-1 (SKUAST-Kashmir)
- Red Gold in Peril: threats to cultivation of saffron in India (ICAR e-pubs)
- PIB: Saffron bowl of India extends to the North East
- Drishti IAS: Decline of saffron production in Kashmir (Jan 2024)
- Injury and not the pathogen is the primary cause of corm rot in saffron (PMC)
