असली दालचीनी (Cinnamomum verum) भारत में छोटे किसान के लिए व्यावहारिक फसल केवल पश्चिमी घाट की तलहटी के नम, ज्यादा बारिश वाले इलाके में है, मुख्यतः केरल, तमिलनाडु और कर्नाटक में। यह मजबूत और उगाने में आसान है, पर उपज कम और देर से आती है: तीसरे से पांचवें साल के बाद लगभग 200 से 250 किलो सूखी क्विल प्रति हेक्टेयर (80 से 100 किलो प्रति एकड़), इसलिए यह घर के बाग या बागान की जमीन पर अतिरिक्त फसल के रूप में ठीक है, अकेली आमदनी के रूप में नहीं।
भारत का दालचीनी व्यापार छोटा है और श्रीलंका की क्विल तथा सस्ती कैसिया से टकराता है। भारतीय क्विल का कोई जांचा हुआ खेत-भाव नहीं मिला, इसलिए एक छोटे टुकड़े से ज्यादा लगाने से पहले अपना खरीदार और भाव तय कर लें।
भारत में यह कहां उगती है
- क्षेत्र: ICAR-IISR के अनुसार दालचीनी पश्चिमी घाट की निचली ऊंचाइयों में, खासकर केरल और तमिलनाडु में उगती है; कर्नाटक में भी उगाई जाती है।
- बारिश: साल में 150 से 250 सेमी (TNAU); 200 से 250 सेमी आदर्श मानी गई है (KAU)। यह ज्यादातर बारानी फसल है।
- ऊंचाई: TNAU अपने क्षेत्र के लिए 800 से 1,000 मीटर देता है; KAU के अनुसार यह समुद्र तल से लगभग 1,800 मीटर तक अच्छी चलती है। बारिश ज्यादा हो तो चौड़ी रेंज में अच्छी बढ़त बताई गई है।
- मिट्टी: गहरी, अच्छे जल निकास वाली, ह्यूमस से भरपूर रेतीली या लैटेराइट मिट्टी।
किस्में
| किस्म | स्रोत | खास बातें | उपयोग |
|---|---|---|---|
| Navasree (Navashree) | ICAR-IISR | लगभग 200 से 250 किलो सूखी क्विल प्रति हेक्टेयर; छाल का तेल 2.7%, छाल में cinnamaldehyde 73% | क्विल और छाल का तेल |
| Nithyasree (Nithyashree) | ICAR-IISR | लगभग 200 किलो सूखी क्विल प्रति हेक्टेयर; छाल का oleoresin 10%; पत्ती के तेल में 78% eugenol | क्विल और पत्ती का तेल |
| Sugandhini | 2000 में जारी (KAU सूची में) | लगभग 125 किलो पत्ती का तेल प्रति हेक्टेयर, जिसमें 94% eugenol | पत्ती का तेल |
TNAU YCD 1, PPI-1 और Konkan Tej भी गिनाता है। पौधे IISR, राज्य कृषि विश्वविद्यालय या Spices Board से मान्यता प्राप्त नर्सरी से लें।
रोपाई और दूरी
- प्रवर्धन: लगभग 10 सेमी लंबी, 2 पत्तियों वाली अर्ध-कठोर कलमें, 2,000 ppm IBA में डुबोकर, छाया में रेत या रेत और नारियल जटा (1:1) की पॉलिथीन थैलियों में जमाई जाती हैं।
- दूरी: TNAU और KAU दोनों 60 x 60 x 60 सेमी के गड्ढों में 2 मी x 2 मी देते हैं। यह लगभग 1,010 पौधे प्रति एकड़ (2,500 प्रति हेक्टेयर) है।
- पौधों को नीची झाड़ी के रूप में उगाकर काटा जाता है, ताकि छाल के लिए नई कोंपलें आती रहें।
पोषण
| उम्र | N : P2O5 : K2O प्रति पौधा प्रति वर्ष | जैविक खाद |
|---|---|---|
| पहला साल | 20 : 18 से 20 : 25 ग्राम | रोपाई पर 10 किलो गोबर खाद |
| दूसरा साल | दोगुना (KAU) | हर साल बढ़ाते हैं |
| 10वें साल से | 200 : 180 : 200 से 250 ग्राम | 20 किलो गोबर खाद |
1,010 पौधों पर पूरी मात्रा का मतलब प्रति एकड़ सालाना लगभग 200 किलो नाइट्रोजन है। इसे बारिश के साथ दो बार में दें, और उत्पादों के लिए उर्वरक देखें। 3 से 9 साल की मात्रा इन मानों के बीच बढ़ती है; अपने राज्य कृषि विश्वविद्यालय का पूरा कार्यक्रम अपनाएं।
कीट और रोग
- TNAU शूट बोरर गिनाता है; इसके लिए अपने KVK या राज्य कृषि विभाग से अभी पंजीकृत उत्पाद पूछें और लेबल के हिसाब से चलें। KAU cinnamon butterfly और पत्ती सुरंगक (quinalphos 0.05% छिड़काव) और पत्ती धब्बा (मानसून में 1% बोर्डो मिश्रण) बताता है।
- पुरानी सिफारिशों में ऐसे रसायन हो सकते हैं जो अब हटा दिए गए हैं। ताजा लेबल मानें और छिड़काव से पहले अपने KVK से अनुमत उत्पाद पूछें; देखें कीट।
तुड़ाई, उपज और प्रसंस्करण
- पहली कटाई: रोपाई के लगभग 3 साल (KAU) से 4 से 5 साल (TNAU) बाद। कोंपलें साल में दो बार, लगभग मई और नवंबर में, काटी जाती हैं (TNAU)।
- कौन सी टहनियां: TNAU 18 से 24 महीने की, लगभग 1 मीटर लंबी और 1 से 2 सेमी मोटी टहनियां छीलता है। KAU 2 से 2.5 सेमी मोटी और 1.5 से 2 मीटर लंबी बताता है।
- उपज: TNAU प्रति झाड़ी लगभग 100 ग्राम सूखी छाल और प्रति हेक्टेयर सालाना 35 किलो पत्ती का तेल बताता है; 2,500 झाड़ियों पर यह लगभग 250 किलो प्रति हेक्टेयर (100 किलो प्रति एकड़) है। KAU Navasree के लिए 250 किलो और Nithyasree के लिए 200 किलो सूखी क्विल प्रति हेक्टेयर देता है।
- प्रसंस्करण: बाहरी छाल खुरची जाती है, भीतरी छाल पट्टियों में छीली जाती है, क्विल बनाकर छाया में सुखाई जाती है। छीलने और लपेटने का हुनर ग्रेड तय करता है, इसलिए अनुभवी कारीगर से सीखें।
- बताई गई तेल मात्रा: छाल का तेल 0.2 से 0.5%, पत्ती का तेल 0.5 से 0.7%, oleoresin 10 से 12% (KAU)।
लागत और कमाई
- भाव: भारतीय क्विल का कोई जांचा हुआ खेत-भाव नहीं मिला। 2024 में भारत का औसत निर्यात मूल्य लगभग US$7.8 प्रति किलो (करीब ₹646) था, 603 टन निर्यात पर; यह आंकड़ा अलग-अलग ग्रेड और पुनर्निर्यात मिलाकर है, इसलिए किसान को इससे कम मिलेगा। मौजूदा भाव Spices Board या स्थानीय व्यापारी से पूछें।
- हिसाब (ऊपरी सीमा, वादा नहीं): प्रति एकड़ 100 किलो क्विल x ₹646 = सालाना लगभग ₹64,600 निर्यात भाव पर। उसके आधे भाव पर लगभग ₹32,000। Sugandhini की पत्ती का तेल (लगभग 125 किलो प्रति हेक्टेयर, यानी 50 किलो प्रति एकड़) अतिरिक्त है, पर तेल का कोई भाव जांचा नहीं गया।
- शुरुआती खर्च ज्यादातर पौधे (लगभग 1,010 प्रति एकड़), गड्ढे, खाद और मजदूरी है; प्रति एकड़ कोई जांचा आंकड़ा नहीं मिला। कमाई साल 3 से 5 के बाद ही शुरू होती है, इसलिए यह उन किसानों के लिए ठीक है जिनकी दूसरी आय है।
बाजार और जोखिम
- श्रीलंका मूल्य के हिसाब से दुनिया के लगभग 80% दालचीनी निर्यात देता है, और कैसिया, यानी संबंधित प्रजातियों की छाल, भी दालचीनी के नाम से बिकती है। भारतीय किसान को इसी मुकाबले का सामना करना पड़ता है, इसलिए पहले स्थानीय खरीदार पक्का करें।
- समूह में बेचने से ढुलाई और व्यापार का खर्च घट सकता है: देखें FPO, निर्यात खरीदार और सब्सिडी खोजक। Spices Board के क्षेत्रीय कार्यालय या अपने राज्य के बागवानी विभाग से पूछें कि क्या कोई रोपण या कटाई-उपरांत योजना अभी दालचीनी पर लागू है।
