बटन मशरूम का कम्पोस्ट बनाकर बेचना व्यावसायिक स्तर का काम है, घर के पीछे का काम नहीं: इसके लिए छत वाला पक्के फर्श का यार्ड, बहुत सारा गेहूं का भूसा और मुर्गी की खाद चाहिए, और सबसे अच्छे उत्पाद के लिए एक इंसुलेटेड कमरा या टनल जहां कम्पोस्ट को भाप से पाश्चराइज किया जाता है। यह तभी फायदे का है जहां बटन मशरूम उगाने वालों का समूह पहले से है और कम्पोस्ट खुद बनाने के बजाय खरीदता है, जैसे हिमाचल प्रदेश में सोलन के आसपास और पंजाब व हरियाणा की पट्टी में।

कम्पोस्ट बटन मशरूम फार्म की मुख्य लागत है। सोलन मशरूम क्षेत्र की एक रिपोर्ट ने इसे उत्पादन लागत का लगभग एक चौथाई बताया, और जब सड़क चौड़ी करने के लिए स्थानीय कम्पोस्ट यार्ड हटाया गया और उत्पादकों को पंजाब व हरियाणा से कम्पोस्ट लाना पड़ा तो उनकी लागत लगभग 30% बढ़ गई। यहां गुणवत्ता ही उत्पाद है: कम्पोस्ट अच्छी उपज दे तभी उत्पादक दोबारा खरीदते हैं। अगर लक्ष्य कम्पोस्ट बेचना नहीं बल्कि मशरूम उगाना है तो बटन मशरूम की खेती देखें।

लंबी विधि और छोटी विधि

दोनों विधियां भूसे और नाइट्रोजन स्रोतों को ऐसे चुनिंदा माध्यम में बदलती हैं जिस पर बटन मशरूम उगता है और प्रतिस्पर्धी फफूंद नहीं। छोटी विधि में नियंत्रित पाश्चराइजेशन चरण (फेज II) जुड़ता है और कम्पोस्ट बेचने वाले को इसी के हिसाब से योजना बनानी चाहिए।

लंबी विधिछोटी विधि
समय28 से 30 दिन, सब कुछ खुले में16 से 20 दिन: लगभग 8 दिन खुले में (फेज I) फिर पाश्चराइजेशन (फेज II)
पलटाईदिन 5, 10, 14, 18, 22 और 26दिन 2, 4, 6 और 8
मशरूम उपज (TNAU)प्रति 100 किग्रा कम्पोस्ट 10 से 15 किग्राप्रति 100 किग्रा कम्पोस्ट 18 से 25 किग्रा
जरूरतखुला यार्ड, पलटाई के लिए मजदूरछत वाला यार्ड, इंसुलेटेड कमरा या टनल, भाप की व्यवस्था

भारत में इस्तेमाल होने वाले फार्मूले

  • लंबी विधि, सिंथेटिक कम्पोस्ट (TNAU): 250 किग्रा कटा हुआ गेहूं का भूसा (8 से 12 सेमी), 25 किग्रा गेहूं की चोकर, 4 किग्रा अमोनियम सल्फेट या कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट, 3 किग्रा यूरिया और 20 किग्रा जिप्सम। जिप्सम दो हिस्सों में दिन 14 और 18 पर डाला जाता है।
  • लंबी विधि, प्राकृतिक कम्पोस्ट (TNAU): घोड़े की लीद और गेहूं या जौ का भूसा 4:3 अनुपात में, प्रति टन 100 किग्रा मुर्गी खाद, 5 किग्रा यूरिया और 25 किग्रा जिप्सम के साथ।
  • छोटी विधि (TNAU, सोलन फार्मूला): प्रति 1,000 किग्रा गेहूं के भूसे पर 400 किग्रा मुर्गी खाद, 72 किग्रा जौ या ब्रूअर्स ग्रेन, 14.5 किग्रा यूरिया और 30 किग्रा जिप्सम। बड़ा बैच बनाने से पहले सही मात्रा ICAR-DMR सोलन या अपने KVK से पक्की कर लें, क्योंकि प्रकाशित शीटें अलग-अलग आधार लेती हैं।
  • गन्ने की खोई (बगास): ICAR-DMR सोलन ने खोई आधारित कम्पोस्ट का मानक तैयार किया है और गेहूं, धान या सरसों के भूसे के कम्पोस्ट से अधिक उपज और प्रोटीन बताया है। जहां भूसा महंगा है वहां चीनी मिलों के पास खोई पर विचार करना चाहिए।
  • अन्य भूसे: पश्चिम बंगाल में लंबी विधि के एक ट्रायल में धान का भूसा और मक्के के डंठल 1:1 मिलाने पर सबसे अच्छा नतीजा मिला, 8 किग्रा कम्पोस्ट बैग पर 1,020 ग्राम मशरूम (जैविक दक्षता 12.75%)। केवल मक्के के डंठल के कम्पोस्ट से 643 ग्राम मिला और उसमें संक्रमण का खतरा रहा। ये कम उपज हैं, इसलिए जहां मिले वहां गेहूं का भूसा या खोई इस्तेमाल करें।

चरण दर चरण (छोटी विधि)

  • भिगोना और ढेर लगाना: भूसे को काटकर पूरी तरह भीगने तक भिगोएं, मुर्गी खाद और अन्य सप्लीमेंट मिलाएं, और निकासी वाले साफ कंक्रीट फर्श पर ढेर लगाएं ताकि बहता पानी जमा न हो।
  • फेज I की पलटाई: दिन 2, 4, 6 और 8 पर ढेर पलटें, जरूरत पर पानी और जिप्सम डालें। बड़ी मात्रा में कम्पोस्ट टर्नर मशीन हाथ से पलटने से ज्यादा बराबर मिश्रण देती है।
  • फेज II पाश्चराइजेशन: कम्पोस्ट को अच्छी तरह इंसुलेटेड कमरे या टनल में ले जाएं और भाप से लगभग चार घंटे 52 से 54 °C तक पहुंचाएं, फिर कम्पोस्ट को 52 से 60 °C पर रखें। इससे कीट और फफूंद मरते हैं और अमोनिया निकल जाती है। तैयार कम्पोस्ट से मीठी गंध आनी चाहिए, अमोनिया की नहीं, और वह नरम हो, चिपचिपे डले न हों।
  • स्पॉनिंग: कम्पोस्ट ठंडा करें, स्पॉन मिलाएं और ट्रे या बैग भरें। कई उत्पादक तैयार कम्पोस्ट खरीदकर खुद स्पॉनिंग करते हैं।
💡 सुझाव: कम्पोस्ट में बची अमोनिया पहली फसल के फेल होने का सबसे आम कारण है। जब तक गंध की जांच पास न हो और फेज II के तापमान का रिकॉर्ड पूरा न हो, बैच न बेचें।

कम्पोस्ट यूनिट लगाना

  • जगह: ढका हुआ कंक्रीट का फेज I यार्ड, बॉयलर वाला फेज II कमरा या टनल, भराई के लिए साफ जगह और भूसे का भंडार। भूसा भारी जगह घेरता है, इसलिए गेहूं के खेतों या चीनी मिल से कम दूरी पर जगह चुनें।
  • लागत और क्षमता: पूरे कम्पोस्ट प्लांट की लागत का कोई सत्यापित भारतीय आंकड़ा नहीं मिला। यार्ड, टनल और बॉयलर के कोटेशन लें, प्रोजेक्ट रिपोर्ट के लिए राज्य बागवानी विभाग से पूछें, और सब्सिडी के विकल्प तथा किसान क्रेडिट कार्ड से कर्ज देखें।
  • प्रदूषण और पड़ोसी: मुर्गी खाद और सड़ता भूसा बदबू करते हैं। यूनिट को घरों से दूर रखें और बहता रस गड्ढे में ले जाएं।

कमाई

  • अपने कोटेशन से तैयार कम्पोस्ट की प्रति टन लागत निकालें: भूसा, मुर्गी खाद, यूरिया, जिप्सम और सप्लीमेंट, पलटाई व भराई की मजदूरी, बॉयलर ईंधन, बिजली और ढुलाई। इसे बैच से मिले कम्पोस्ट के टन से भाग दें।
  • अपने क्षेत्र के उत्पादकों से चालू भाव पूछें, फिर तुलना करें: प्रति टन आय में से प्रति टन लागत घटाकर साल में बिके टन से गुणा करें, फिर प्लांट की लागत घटाएं।
  • उत्पादक की तरफ से जांच: 18 से 25 किग्रा मशरूम प्रति 100 किग्रा कम्पोस्ट (छोटी विधि, TNAU) पर एक टन कम्पोस्ट से 180 से 250 किग्रा बटन मशरूम मिलना चाहिए। चालू भाव मंडी भाव पर देखें।

बाजार और बिक्री

  • खरीदार: छोटे और मध्यम बटन मशरूम उत्पादक जिनके पास कम्पोस्टिंग की जगह या कौशल नहीं है, और वे उत्पादक जिन्हें दो फसलों के बीच जल्दी दोबारा शुरू करना है।
  • जोखिम: मांग स्थानीय और केंद्रित है; एक खराब बैच ग्राहक को हमेशा के लिए खो देता है; आपका दाम ज्यादा हुआ तो उत्पादक खुद कम्पोस्ट बना सकता है; और मशरूम के दाम गिरने से उत्पादकों की मांग घटती है। इस्तेमाल हो चुका कम्पोस्ट सब्जी और नर्सरी उत्पादकों को मिट्टी सुधारक के रूप में बेचकर थोड़ी अतिरिक्त आय हो सकती है।
  • उत्पादकों का समूह FPO के जरिए साझा यूनिट बनाकर लागत बांट सकता है।

स्रोत