बेल मध्य और उत्तर भारत की सूखी, कमजोर या खारी जमीन पर भी अच्छी चलती है, और यह उन गिने-चुने फलदार पेड़ों में है जिन्हें जमने के बाद लगभग सिंचाई नहीं चाहिए। दिक्कत समय और भाव की है: कलमी पेड़ 4 से 5 साल में फल देते हैं, पूरी उपज 8 से 10 साल बाद आती है, और फल का मंडी भाव बहुत ऊपर-नीचे होता है, इसलिए यह उन किसानों के लिए ठीक है जो इंतजार कर सकें और जिनके पास प्रोसेसिंग या स्थानीय शरबत का बाजार हो।
शोध केंद्रों के अनुसार अच्छी देखभाल वाले बाग में 10वें साल तक प्रति पेड़ 50 से 60 किलो फल मिल सकते हैं। नीचे के आंकड़े ICAR संस्थानों और जबलपुर विश्वविद्यालय के ट्रायल से हैं। ये शोध केंद्र के नतीजे हैं, इसलिए उतनी देखभाल के बिना खेत पर इससे कम मिलेगा।
भारत में यह कहां उगता है
- राज्य: मध्य प्रदेश बेल के प्रमुख राज्यों में है, जहां 2020-21 में 1,292 हेक्टेयर में 15,102 टन फल हुआ। छिंदवाड़ा, सिवनी, जबलपुर और नरसिंहपुर मुख्य उत्पादक जिले हैं। उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र में भी सूखी जमीन पर बेल उगता है।
- जलवायु: ICAR-CISH, लखनऊ के अनुसार इसे 1,200 मीटर ऊंचाई तक उगाया जा सकता है और यह 7°C से 48°C तक सह लेता है।
- मिट्टी: अच्छे जल निकास वाली रेतीली दोमट आदर्श है, लेकिन pH 6.0 से 8.5, 30 ESP तक क्षारीयता और 9 dS/m तक खारापन वाली मिट्टी में भी चलता है। समस्या वाली जमीन पर बेल को "scavenger" पेड़ की तरह लगाया जाता है।
- बारिश: Goma Yashi ने बिना सिंचाई ऐसी जगह आर्थिक उपज दी जहां सालाना बारिश 300 से 910 मिमी रही (10 साल का औसत करीब 790 मिमी), और इसे 400 मिमी तक की बारिश में फलने वाला बताया गया है।
- सूखी गर्मी में पेड़ अपनी सारी पत्तियां गिरा देता है, जिससे वह गर्म सूखी हवाओं से बच जाता है।
किस्में
| किस्म | स्रोत | खासियत | कहां के लिए ठीक |
|---|---|---|---|
| Goma Yashi | CHES गोधरा (ICAR-CIAH), 2010 में जारी | बौना, कांटे रहित, बहुत पतला छिलका, कम रेशा और लेस; फल 1.00 से 1.62 किलो, गूदा 72 से 75%; अप्रैल में पकता है | असिंचित अर्ध-शुष्क जमीन; 5 x 5 मीटर पर सघन रोपण |
| CISH Bael-1 | ICAR-CISH, लखनऊ | छिलका सिर्फ 0.12 से 0.15 सेमी मोटा, फल करीब 1 किलो, गूदा 65.6%, TSS 38°Brix, अप्रैल से मई में पकता है; 10 से 12 साल पर प्रति पेड़ 50 से 80 किलो | जूस और प्रोसेसिंग |
| CISH Bael-2 | ICAR-CISH, लखनऊ | जबलपुर के 10 साल पुराने पेड़ों के ट्रायल में प्रति पेड़ सबसे ज्यादा फल (33.96) | ज्यादा उपज, मध्य भारत |
| Narendra Bael-5, -7, -9, -17 | NDUAT, कुमारगंज | जबलपुर ट्रायल में NB-7 का फल सबसे भारी (3.97 किलो) और गूदा सबसे ज्यादा (70.71%) रहा; उपज के लिए NB-17 को CISH Bael-2 के साथ सुझाया गया | उत्तर प्रदेश और मध्य भारत |
रोपण सामग्री और दूरी
- पौध बीज से बनती है, जिसे निकालते ही जून में बोया जाता है, और करीब एक साल बाद कलम या ग्राफ्ट बांधा जाता है। जून से जुलाई में पैच बडिंग से 80 से 90% सफलता मिलती है। बीज वाले पेड़ 7 से 8 साल बाद ही फल देते हैं, कलमी पौधे 4 से 5 साल में, इसलिए किसी नामी किस्म के कलमी पौधे ही लें।
- सामान्य दूरी: 1 मीटर x 1 मीटर x 1 मीटर के गड्ढों में 8 x 8 मीटर, यानी करीब 63 पेड़ प्रति हेक्टेयर (25 प्रति एकड़)। रोपाई से दो महीने पहले (अप्रैल से मई) हर गड्ढे की ऊपरी मिट्टी में 30 से 40 किलो सड़ी गोबर की खाद और 1 किलो नीम की खली या 0.5 किलो बोन मील मिलाएं। क्षारीय मिट्टी में 5 से 8 किलो जिप्सम और 20 किलो रेत डालें।
- सघन रोपण: बौनी Goma Yashi को 5 x 5 मीटर पर आजमाया गया, यानी प्रति हेक्टेयर 400 पेड़ (करीब 162 प्रति एकड़)।
- कलमी पौधे जुलाई से अगस्त में लगाएं। डंडे के सहारे सीधा बढ़ाएं, तने पर 75 सेमी तक कोई शाखा न रहने दें, फिर 4 से 6 मुख्य शाखाएं रखें।
- शुरुआती सालों में अंतर-फसलें: मटर, लोबिया, मूंग, उड़द, ग्वार, बैंगन, टमाटर, धनिया, मिर्च, लहसुन या सरसों। ज्यादा पानी या ज्यादा खाद मांगने वाली फसलें न लें।
खाद और सिंचाई
- CISH की सारणी में 1 साल के पौधे के लिए प्रति पौधा 5 किलो गोबर की खाद, 50 ग्राम N, 25 ग्राम P और 50 ग्राम K दी जाती है, जिसे हर साल उसी अनुपात में 10 साल तक बढ़ाया जाता है। 10 साल या उससे बड़े पेड़ को 50 किलो गोबर की खाद, 1 किलो N, 250 ग्राम P और 500 ग्राम K मिलता है। साल में दो बार बांटकर दें।
- क्षारीय मिट्टी में प्रति पेड़ 250 ग्राम जिंक सल्फेट से जिंक की कमी ठीक होती है। जहां फल फटने की समस्या है, वहां खाद के साथ बोरेक्स दिया जाता है (CISH के नोट में प्रति पेड़ 250 ग्राम और 50 से 100 ग्राम दोनों लिखे हैं, इसलिए मात्रा अपने KVK से पक्की कर लें)।
- छोटे पौधे: गर्मी में हर 10 से 15 दिन और सर्दी में महीने में एक बार पानी दें। फल देने वाले बाग में आमतौर पर सिंचाई नहीं चाहिए; पानी हो तो मई से जून में नई पत्तियां आने के बाद हर 20 से 30 दिन पर एक सिंचाई मदद करती है। छोटे पौधों के लिए drip irrigation देखें।
- थाले में धान की पराली या गन्ने की पत्ती की मल्च बिछाएं। यह क्षारीय और बीहड़ जमीन पर अच्छी चली।
कीट और रोग
- CISH के अनुसार CISH Bael-1 पर कीट और रोग का असर कम होता है, मुख्य समस्या canker और gummosis की है। Canker में streptomycin 200 ppm का छिड़काव किया जाता है; gummosis में तांबे वाली फफूंदनाशक की पेस्ट लगाई या छिड़काव की जाती है।
- पत्ती का घुन और पत्ती खाने वाली इल्ली मुख्य कीट हैं। दवा, मात्रा और छिड़काव के बीच के अंतर के लिए लेबल और अपने KVK की सलाह मानें। pests देखें।
- फल फटना ज्यादातर दिसंबर से जनवरी में होता है। जड़ों में एक जैसी नमी, पुआल की मल्च और हवा रोकने वाली बाड़ से यह घटता है।
कटाई और उपज
- जब छिलका गहरे हरे से पीलापन लिए हरा हो जाए तब तोड़ें (CISH Bael-1 में अप्रैल से मई)। हर फल को करीब 2 सेमी डंठल के साथ काटें; डंठल का आसानी से अलग होना पकने का संकेत है।
- गोधरा में असिंचित ट्रायल में Goma Yashi में 2रे साल से फल लगे, 5वें साल के बाद आर्थिक उपज मिली, और प्रति पेड़ उपज 2रे साल 0.57 किलो से 10वें साल 59.27 किलो तक पहुंची, यानी 400 पेड़ प्रति हेक्टेयर पर करीब 237 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (करीब 96 क्विंटल प्रति एकड़)।
- CISH Bael-1: 8 x 8 मीटर की दूरी पर 10 से 12 साल में प्रति पेड़ 50 से 80 किलो, जो मोटे तौर पर 3 से 5 टन प्रति हेक्टेयर बैठता है।
- 9वें और 10वें साल में मई में, पत्तियां झड़ी होने पर, उस साल की बढ़वार की करीब 25% छंटाई की गई ताकि छतरी खुली रहे।
लागत और कमाई
- शोध केंद्र का उदाहरण: Goma Yashi ट्रायल में असिंचित हालत में 10वें साल ₹10 प्रति किलो पर ₹1,87,080 प्रति हेक्टेयर और ₹20 प्रति किलो पर ₹4,24,160 प्रति हेक्टेयर का शुद्ध मुनाफा बताया गया है। कुल आय ₹10 पर ₹2,37,080 और ₹20 पर ₹4,74,160 प्रति हेक्टेयर रही। ये 10वें साल के आंकड़े हैं, बाग की पूरी उम्र का सालाना औसत नहीं।
- मंडी भाव (Agmarknet, ACROP के जरिए, 2026): कटनी में ₹72 प्रति किलो (7 मई 2026), देवरी में ₹30 प्रति किलो, और मध्य प्रदेश की एक और मंडी में करीब ₹40 प्रति किलो। ₹40 प्रति किलो पर 59 किलो प्रति पेड़ से करीब ₹2,360 प्रति पेड़ बनता है, यानी 162 पेड़ पर करीब ₹3.8 लाख प्रति एकड़। ₹30 प्रति किलो और 8 x 8 मीटर की दूरी (25 पेड़ प्रति एकड़) पर ज्यादा सावधानी वाले 30 किलो प्रति पेड़ से कुल आय करीब ₹22,500 प्रति एकड़ बैठती है।
- कुल लागत दूरी, गड्ढे भरने और मजदूरी पर निर्भर करती है; भारत के लिए कोई एक पक्का खेती-लागत आंकड़ा नहीं मिला, इसलिए MIDH की मौजूदा यूनिट लागत अपने राज्य के बागवानी विभाग से पूछें।
बाजार और बिक्री
- फल शहर के बाजारों में शरबत के लिए ताजा बिकता है, और गूदा प्रोसेसरों को जाता है जो स्क्वैश, कैंडी, पाउडर और आयुर्वेदिक उत्पाद बनाते हैं। मध्य प्रदेश में कटनी, मंडला, बैतूल, झाबुआ, छिंदवाड़ा, शिवपुरी और श्योपुर प्रमुख व्यापार केंद्र बताए गए हैं।
- मंडियों और मौसम के बीच भाव बहुत बदलते हैं (ऊपर के उदाहरणों में ₹30 से ₹72 प्रति किलो), इसलिए mandi bhav देखें और जहां हो सके समूह के जरिए गूदा या पाउडर बेचें। FPO देखें।
- कर्ज और मदद के लिए KCC और subsidy finder देखें। अपने राज्य के बागवानी विभाग से पूछें कि आपके जिले में बेल का रोपण MIDH में आता है या नहीं।
स्रोत
- Evaluation of bael varieties under semi-arid conditions of Madhya Pradesh, Indian Journal of Arid Horticulture 2025 (JNKVV, Jabalpur)
- CISH-Bael-1: new cultivar with thin shell, Indian Horticulture (ICAR-CISH)
- Cultivating Goma Yashi bael under high density, Indian Horticulture (CHES Godhra, CIAH)
- ACROP, bael mandi prices in Madhya Pradesh (Agmarknet data)
