Aquilaria malaccensis से मिलने वाली अगरवुड (ऊद) असल में सिर्फ गर्म और नम पूर्वोत्तर में ही चल पाती है, मुख्य रूप से असम, त्रिपुरा और आसपास के पहाड़ी राज्यों में। कोई भी आमदनी होने से पहले इसमें 8 या उससे ज्यादा साल लगते हैं, इनोक्यूलेशन का कोई कारगर तरीका चाहिए और कानूनी कागजात पूरे करने पड़ते हैं। यह एक खास और ज्यादा जोखिम वाली फसल है। खुशबूदार राल तभी बनती है जब पेड़ को घाव लगे और उसमें संक्रमण हो, और कितनी राल मिलेगी इसका पहले से अंदाजा नहीं लगता।

खबरों में टॉप-ग्रेड चिप्स के जो दाम बताए जाते हैं वे बहुत ऊंचे हैं, लेकिन मई 2026 में असम से हुआ पहला कानूनी निर्यात दिखाता है कि आम खेप का भाव क्या मिलता है। कुछ भी लगाने से पहले बाजार वाला हिस्सा जरूर पढ़ें।

भारत में यह कहां उगती है

  • A. malaccensis पूर्वोत्तर के आठ राज्यों की मूल प्रजाति है: अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा। भारत की दूसरी प्रजाति A. khasiana मुख्य रूप से मेघालय की खासी पहाड़ियों में मिलती है।
  • असम में रिपोर्टों के मुताबिक गोलाघाट, जोरहाट, शिवसागर और होजाई जिलों में राज्य के 90 प्रतिशत से ज्यादा अगरवुड पेड़ हैं (Sentinel Assam)।
  • ज्यादातर पेड़ निजी जमीन पर हैं। भारत में जंगल से अगरवुड काटने की इजाजत नहीं है।
  • पेड़ को गर्म, नम और ज्यादा बारिश वाला इलाका चाहिए, जहां मिट्टी में पानी निकल जाता हो और जलभराव न हो। बारिश, तापमान या मिट्टी के pH का कोई जांचा-परखा ICAR या ICFRE का आंकड़ा नहीं मिला, इसलिए यहां कोई आंकड़ा नहीं दिया गया है। पूर्वोत्तर के बाहर लगाने से पहले Rain Forest Research Institute (RFRI), जोरहाट से पूछें।

रोपाई का सामान और दूरी

  • भरोसेमंद नर्सरी से पौधे लगाएं। RFRI ने कलम या कटिंग से पौधे तैयार करने पर काम किया है, लेकिन आम तौर पर बीज से बने पौधे ही चलते हैं।
  • दूरी कोई पक्का नियम नहीं है, यह आपका अपना फैसला है। हिसाब के लिए: 8 फुट x 8 फुट पर करीब 680 पौधे प्रति एकड़ (1,680 प्रति हेक्टेयर) आते हैं, और 10 फुट x 10 फुट पर करीब 435 प्रति एकड़ (1,075 प्रति हेक्टेयर)। असम की प्रेस रिपोर्टों में 4,320 पेड़ प्रति हेक्टेयर (करीब 1,750 प्रति एकड़) तक का जिक्र है, जो बहुत घना रोपण है। सभी पेड़ इनोक्यूलेशन पर एक जैसा असर नहीं दिखाते, इसीलिए उगाने वाले जितने पेड़ काटने की उम्मीद रखते हैं उससे ज्यादा लगाते हैं।
  • किसी राज्य विश्वविद्यालय या ICAR स्रोत से अगरवुड के लिए खाद का कोई जांचा-परखा कार्यक्रम नहीं मिला, इसलिए कोई कार्यक्रम नहीं दिया गया है। छोटे पौधों को निराई और छाया चाहिए, खड़े पानी से बचाएं।

इनोक्यूलेशन: वह कदम जो सब कुछ तय करता है

  • प्राकृतिक रूप से राल बनना कम ही होता है। छपी समीक्षाओं में आम सलाह यह है कि पेड़ों को करीब 6 से 8 साल की उम्र में कृत्रिम तरीके से इनोक्यूलेट किया जाए।
  • RFRI जोरहाट ने A. malaccensis में इनोक्यूलेशन का तरीका तय करने पर शोध किया है और अप्रैल 2024 में खेती और कृत्रिम इनोक्यूलेशन पर तीन दिन का प्रशिक्षण चलाया। नए किसान को सबसे पहले यहीं संपर्क करना चाहिए।
  • तरीके ड्रिल करने और घाव देने से लेकर फफूंद या सूक्ष्मजीव वाले इनोक्यूलेंट तक अलग-अलग हैं। निजी "इनोक्यूलेशन किट" बेचने वाले कई लोग बड़े-बड़े दावे करते हैं। उनसे अपनी उम्र और अपनी जगह जैसे पेड़ों पर नतीजे मांगें, और पहले के ग्राहकों के तेल या चिप्स के ग्रेड दिखाने को कहें।
  • एक समीक्षा कहती है कि इनोक्यूलेशन के करीब तीन साल बाद लकड़ी काट लेनी चाहिए, वरना राल की मात्रा घटने लगती है। दूसरे उगाने वाले इससे ज्यादा इंतजार करते हैं। समय को अभी तय नहीं मानें और पहले कुछ पेड़ों पर आजमाकर देखें।
  • कटाई का मौसम: असम की रिपोर्टों के अनुसार अक्टूबर से अप्रैल तक तेल निकालने के लिए सबसे अच्छा रहता है।

समय सारणी

चरणलगभग समय
पौधे लगाना और जमानासाल 0 से 6 या 8, कोई आमदनी नहीं
कृत्रिम इनोक्यूलेशनकरीब साल 6 से 8
राल बननाकरीब 1 से 3 साल या उससे ज्यादा
पहली बिक्रीअसल में साल 9 से 12

कीट और रोग

भारत के अगरवुड बागानों के लिए कीटों का कोई जांचा-परखा कार्यक्रम नहीं मिला। आम सलाह: जड़ सड़न से बचने के लिए पानी की निकासी अच्छी रखें, पत्ते खाने वाली इल्लियों और तना छेदक कीटों पर नजर रखें, और कोई भी समस्या हो तो अंदाजे से छिड़काव करने के बजाय अपने स्थानीय KVK या RFRI के पास ले जाएं। किसी भी कीटनाशक के लेबल का पालन करें। ध्यान रहे कि छेदक कीड़ों से लगे घाव नियंत्रित इनोक्यूलेशन की जगह नहीं ले सकते।

लागत और कमाई: क्या कहा जा सकता है और क्या नहीं

  • भारतीय अगरवुड के लिए प्रति पेड़ उपज के ऑडिट किए आंकड़ों वाला कोई ICAR, NABARD या NHB का मॉडल प्रोजेक्ट नहीं मिला। नीचे दिया हर आंकड़ा या तो एक दावा है या सीधा हिसाब, जांचा हुआ औसत नहीं।
  • दावा: असम की प्रेस रिपोर्टें 4,320 पेड़ों पर 15 से 16 साल बाद करीब ₹4.32 करोड़ प्रति हेक्टेयर का अनुमान बताती हैं, जो ₹10,000 प्रति पेड़ बैठता है। यह प्रचार वाला अनुमान है, देखा गया औसत नहीं।
  • देखा गया: मई 2026 में असम की पहली कानूनी खेप 100 किलो सऊदी अरब और 12 किलो UAE को गई, जिसकी कुल कीमत ₹2.35 करोड़ आंकी गई। 112 किलो माल पर यह करीब ₹2,100 प्रति किलो बैठता है (यह हिसाब यहां का अपना है)। यह भाव ग्रेड से तय होता है, और खेप में ग्रेड का बंटवारा नहीं बताया गया।
  • सुर्खियों में चिप्स के दाम ₹2,50,000 प्रति किलो तक बताए जाते हैं। यह सिर्फ सबसे ऊंचे ग्रेड पर लागू होता है, और बागानों की ज्यादातर लकड़ी उस ग्रेड की नहीं होती।
  • ऐसा बेस केस सोचकर चलें जिसमें आपके सिर्फ कुछ पेड़ों से बिकने लायक राल वाली लकड़ी मिलती है और बाकी कम ग्रेड की लकड़ी के रूप में बिकते हैं या नाकाम हो जाते हैं। जमीन, नर्सरी के पौधों, 8 से ज्यादा साल की देखभाल और इनोक्यूलेशन का खर्च पहले आता है, और तब तक कोई आमदनी नहीं होती।

बाजार और बिक्री

  • खरीदार हैं ऊद का तेल निकालने वाले, अगरबत्ती और इत्र बनाने वाले, और पश्चिम एशिया व पूर्वी एशिया को निर्यात करने वाले। असम में उत्पादकों और व्यापारियों का एक संघ है, और गोलाघाट के लिए एक अंतरराष्ट्रीय व्यापार केंद्र की घोषणा हुई है (रिपोर्टों में 2025 में आने की बात थी; मौजूदा स्थिति देख लें)।
  • अगरवुड CITES के परिशिष्ट II में सूचीबद्ध है। निर्यात के लिए CITES परमिट चाहिए; मई 2026 की असम की खेप के लिए DGFT से प्रतिबंधित निर्यात लाइसेंस भी चाहिए था। घरेलू और निर्यात नियम भारतीय वन अधिनियम, वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम और 2023 के अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों पर आधारित हैं। एक समीक्षा बताती है कि अब तक सही परमिट के साथ बहुत कम निर्यात हुए हैं, यानी कानूनी रास्ते अभी पतले हैं।
  • असम की Agarwood Promotion Policy 2020 (1 जनवरी 2021 से लागू, रिपोर्टों के अनुसार जून 2026 तक बढ़ाई गई) ने प्रेस रिपोर्टों के मुताबिक लगाए गए पेड़ों की कटाई और ढुलाई आसान की और निजी जमीन पर अगरवुड को वन उपज की सूची से हटा दिया। मौजूदा स्थिति असम वन विभाग से पक्की कर लें; दूसरे राज्यों में नियम अलग हैं।
  • buy-back के प्रस्तावों, "ऊद की गारंटीशुदा कमाई" के दावों और ऐसे पौधे बेचने वालों से सावधान रहें जो इनोक्यूलेशन की सेवा भी बेचते हैं। खरीदार का लाइसेंस जांचें और कोई भी अनुबंध किसी जानकार से दिखवा लें।
💡 सुझाव: पौधों पर पैसा खर्च करने से पहले ऐसे उत्पादक के पास जाएं जिसके पेड़ पहले से इनोक्यूलेट हो चुके हैं। उनसे इनोक्यूलेशन का साल, क्या बिका और किस ग्रेड में, किस भाव पर बिका, यह पूछें, और मौजूदा इनोक्यूलेशन तरीके के लिए RFRI जोरहाट से संपर्क करें।

सब्सिडी

असम की नीति में नर्सरी, पौधों और खेती के लिए मदद का वादा है, लेकिन मौजूदा दरें पक्की नहीं हो पाईं। राज्य वन विभाग से पूछें। आम योजनाओं के लिए देखें subsidy finder और KCC।

स्रोत