रक्त चंदन (Pterocarpus santalinus) भारत में निजी जमीन पर उगाया जा सकता है, लेकिन यह 20 से 25 साल की फसल है जिसकी कीमत पूरी तरह इस पर टिकी है कि आप लकड़ी को कानूनी तरीके से काट, ढो और बेच सकें। पेड़ उगाना आसान हिस्सा है; परमिट, कानूनी खरीदारों की छोटी सूची और राज्यवार निर्यात कोटा तय करते हैं कि उगाने वाले को कभी पैसा मिलेगा या नहीं।
यह पेड़ दक्षिणी पूर्वी घाट का मूल निवासी है, मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश में, और कुछ तमिलनाडु और कर्नाटक में। यह CITES Appendix II में (1995 से) सूचीबद्ध है, और कच्ची लकड़ी का निर्यात 2004 से प्रतिबंधित रहा, जब तक निजी जमीन की उगाई लकड़ी का निर्यात शर्तों के साथ नहीं खोला गया। एक भी पौधा खरीदने से पहले अपने राज्य के वन विभाग से मौजूदा नियम पूछ लें।
रोपाई से पहले कानूनी स्थिति
- निर्यात (केंद्र का नियम): DGFT की अधिसूचना 47/2025-26 (4 नवंबर 2025) रक्त चंदन के लट्ठों और जड़ों का निर्यात सिर्फ तभी मानती है जब वे निजी जमीन (पट्टा जमीन समेत) पर उगाई गई हों, और सिर्फ Restricted Export Authorisation के तहत। आवेदन के साथ राज्य के Principal Chief Conservator of Forests (PCCF) का Certificate of Origin चाहिए, जिसमें कानूनी स्रोत से खरीद की तारीख और मात्रा हो, और PCCF द्वारा नामित अधिकारी का स्टॉक का भौतिक सत्यापन प्रमाणपत्र भी।
- सालाना निर्यात कोटा (अप्रैल से मार्च, कृत्रिम रूप से उगाई लकड़ी): आंध्र प्रदेश 280 टन, तमिलनाडु 900 टन, कर्नाटक 10 टन, गुजरात 100 टन, यानी पूरे देश के लिए कुल 1,290 टन। अधिसूचना जंगली रक्त चंदन के लिए शून्य कोटा तय करती है और कहती है कि कोटा की समीक्षा National Detrimental Findings अध्ययन के आधार पर होती है। कोटा निर्यात अनुमतियों के खिलाफ जारी होता है, इसलिए उगाने वाले को फिर भी ऐसा खरीदार चाहिए जिसके पास अनुमति हो।
- कटाई और ढुलाई: 2018 की एक रिपोर्ट में पाया गया कि किसानों को कटाई और ढुलाई के परमिट चाहिए थे जो मिलना मुश्किल था, और पके पेड़ों वाले कुछ उगाने वालों को कानूनी खरीदार नहीं मिला। राज्यों की प्रक्रियाएं अलग हैं और तब से बदली हैं, इसलिए रोपाई से पहले अपने DFO (Divisional Forest Officer) से लिखित में पूछें कि आपकी जमीन पर कौन सा पंजीकरण, कटाई की अनुमति और ट्रांजिट पास लागू होता है।
- चोरी और तस्करी का दबाव: यह भारत की सबसे ज्यादा तस्करी वाली लकड़ियों में है। दशकों तक बागान की रखवाली, जमीन और रोपाई के रिकॉर्ड रखने और जहां आपका राज्य मांगे वहां पेड़ों का पंजीकरण कराने की उम्मीद रखें। बिना कागज के पेड़ कानूनी तौर पर बेचना मुश्किल है।
कहां उगता है और क्या चाहिए
- हैदराबाद में ICFRE Institute of Forest Biodiversity (542 मीटर ऊंचाई, दूरी 5 x 4 मीटर) के एक शोध बागान का 12 साल पर आकलन हुआ: लगाई गई 500 accessions में से 80 प्रतिशत बचीं, औसत ऊंचाई 9.04 मीटर (दायरा 5.5 से 11.8 मीटर) और छाती की ऊंचाई पर औसत घेरा 45 सेमी (दायरा 26 से 78 सेमी) रहा।
- कीमती हिस्सा अंतःकाष्ठ (heartwood) है, और यह धीरे बनता है। उस 12 साल के ट्रायल में 18.5 प्रतिशत accessions में अंतःकाष्ठ 12 साल से पहले बन गया, जबकि आम समय करीब 15 साल है। घेरे और अंतःकाष्ठ की लंबाई में सकारात्मक संबंध (r = 0.44) था, यानी मोटे पेड़ों में अंतःकाष्ठ ज्यादा होता है, पर संबंध सिर्फ मध्यम था।
- TNAU चक्र (rotation) 20 से 25 साल बताता है। अंतःकाष्ठ में करीब 16 प्रतिशत santalin होता है, जो एक प्राकृतिक रंग है।
- देखे गए स्रोतों में मिट्टी और बारिश की सीमाएं नहीं बताई गई थीं। प्राकृतिक क्षेत्र पूर्वी घाट का सूखा, पथरीला, लाल मिट्टी वाला इलाका है; अपने KVK या हैदराबाद के वन अनुसंधान संस्थान से पूछें कि आपकी जगह के लिए यह ठीक है या नहीं।
रोपण सामग्री और दूरी
- बीज: बीज एक साल तक जमने लायक रहता है (TNAU)। करीब 1.2 x 1.2 मीटर की नर्सरी क्यारियों में रेत में मिलाकर बोएं, मिट्टी से ढकें और धान की पुआल की मल्च दें।
- रोपाई: खेत को बारीक भुरभुरा जोतें, 45 x 45 x 45 सेमी के गड्ढे खोदें और 12 महीने के पौधे मिट्टी के गोले के साथ लगाएं।
- दूरी: 4 x 4 मीटर (TNAU), यानी 625 पेड़ प्रति हेक्टेयर (करीब 253 प्रति एकड़)। पौधे ऐसी वन विभाग या संस्थान की नर्सरी से लें जो बीज के स्रोत का रिकॉर्ड रखती हो, क्योंकि खराब पौध से अंतःकाष्ठ पर असर पड़ता है।
- देखभाल: तीसरे साल तक सिंचाई, निराई और छंटाई करें (TNAU)। चराई और आग से बचाव के लिए बाड़ लगाएं।
कटाई और उपज
- कटाई पूरे पेड़ को काटकर होती है, अनुमति के बाद, चक्र के अंत (20 से 25 साल) में। सिर्फ अंतःकाष्ठ कीमती है; रस काष्ठ (sapwood) नहीं।
- कटाई के समय प्रति पेड़ या प्रति हेक्टेयर अंतःकाष्ठ के वजन का कोई पुष्ट भारतीय आंकड़ा नहीं मिला, इसलिए प्रति एकड़ आमदनी जिम्मेदारी से नहीं निकाली जा सकती। Institute of Forest Genetics and Tree Breeding (IFGTB, कोयंबटूर) या हैदराबाद के वन अनुसंधान संस्थान से नापे हुए आंकड़े मांगें।
लागत और कमाई
- भाव: 2018 की एक रिपोर्ट ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में रक्त चंदन ₹50 लाख से ₹1 करोड़ प्रति टन बताया, और कहा कि घरेलू मांग कम होने से भारत में भाव अंतरराष्ट्रीय दर के आधे से भी कम हैं। ये निर्यात-ग्रेड के आंकड़े हैं, उगाने वाले को मिलने वाला भाव नहीं, और ये 2018 के हैं।
- जब्त लकड़ी की सरकारी नीलामियों में ऊंचे ग्रेड पर बहुत ऊंचे भाव दिखे हैं, पर वह राज्य द्वारा बेचा गया जब्त माल है, किसान जिस पर भरोसा कर सके ऐसा भाव नहीं।
- 20 से 25 साल की लागत (पौधे, बाड़, चौकीदार, पहले तीन साल की सिंचाई, निराई और छंटाई, परमिट और ढुलाई का खर्च) का कोई छपा हुआ भारतीय बजट नहीं है। किसी भी प्रचारक के "करोड़ प्रति एकड़" के दावे की तुलना अंतःकाष्ठ की उपज और बेचने के कानूनी रास्ते से करें, और दोनों लिखित में मांगें।
बाजार और जोखिम
- कानूनी खरीदार कम हैं: वन विभाग के नियमों के तहत काम करने वाले अनुमति प्राप्त निर्यातक और लाइसेंसी प्रोसेसर। 2018 की रिपोर्ट के अनुसार घरेलू मांग कम है।
- अगली समीक्षा में नियम, कोटा और परमिट के कदम बदल सकते हैं; आज तय कोटा की हर साल समीक्षा होती है।
- "करोड़ प्रति साल" रक्त चंदन खेती, buy-back के वादे या "परमिट की जरूरत नहीं" जैसे दावे करने वालों से सावधान रहें। बिना कागज के लकड़ी बेचना अपराध है और जब्ती हो सकती है।
- कर्ज के लिए KCC, समूह की मदद के लिए FPO और राज्य की मदद के लिए subsidy finder देखें।
स्रोत
- DGFT Notification No. 47/2025-26 dated 4 November 2025, export policy of Red Sanders
- DGFT annual export quota for artificially propagated red sanders (summary of the notification)
- Evaluation of red sanders germplasm for conservation and breeding, Plant Genetic Resources (ICFRE-IFB, Hyderabad)
- TNAU Agritech Portal, Forestry: Red Sander
- TNAU Agritech Portal, Timber: Red Sanders
- Down To Earth, how the government is encouraging illegal trade in red sanders (2018)
- Down To Earth, red sanders export policy change for cultivated wood (2019)
