सुपारी एक लंबी अवधि की ताड़ फसल है जो तटीय और मलनाड कर्नाटक, केरल, गोवा तथा असम और पश्चिम बंगाल के कुछ हिस्सों की नम, ज्यादा वर्षा वाली पट्टी में, लगभग 1,000 मीटर ऊंचाई तक अच्छे जल निकास वाली गहरी मिट्टी में चलती है। सूखे महीनों में लगातार सिंचाई चाहिए, पूरी पैदावार के लिए कई साल इंतजार करना पड़ता है, और भाव के उतार-चढ़ाव झेलने का धैर्य चाहिए; कर्नाटक और केरल में पीला पत्ता रोग गंभीर जोखिम है।

व्यवहार में "प्रीमियम" सुपारी का मतलब है सुझाई गई किस्म लगाना, पोषण और रोग का प्रबंधन करना, खरीदार की मांगी अवस्था पर कटाई करना और साफ-सुथरा सुखाना व ग्रेडिंग करना। यह पृष्ठ ICAR-CPCRI और Kerala Agricultural University (KAU) की सिफारिशें तथा 3 अक्टूबर 2026 के Agmarknet भाव इस्तेमाल करता है।

कहां उगती है और क्या चाहिए

  • जिले: कर्नाटक में मुख्य उत्पादक जिले शिवमोगा, चिकमगलूरु, तुमकुरु, उत्तर कन्नड़ और दक्षिण कन्नड़ हैं, जिनमें क्षेत्रफल और उत्पादन में शिवमोगा पहले स्थान पर है। केरल का कासरगोड और असम भी प्रमुख क्षेत्र हैं।
  • जलवायु: तापमान 14 से 36 °C के बीच और सालाना वर्षा 750 से 4,500 मिमी; समुद्र तल से 1,000 मीटर तक की ऊंचाई।
  • मिट्टी: कंकरीली लेटराइट और लाल दोमट सबसे अच्छी हैं, साथ ही उपजाऊ चिकनी दोमट और जलोढ़ मिट्टी भी। चिपचिपी चिकनी, बलुई या खारी मिट्टी और ऊंचे जलस्तर वाले खेतों से बचें।

किस्में

किस्मप्रकार और विमोचनचाली पैदावार, किलो प्रति पेड़ प्रति वर्षटिप्पणी
Mangalaअर्ध-लंबी, ICAR-CPCRI3.0जल्दी फल, प्रति गुच्छा ज्यादा मादा फूल, गोल छोटे दाने; पीला पत्ता रोग के प्रति ज्यादा सहनशील भी बताई गई
Sumangalaलंबी, ICAR-CPCRI3.28अंडाकार, मध्यम आकार के दाने
SAS-11995 में जारी, सिरसी घाटियां, कर्नाटक4.60सिरसी जैसी घाटी की परिस्थितियों के लिए उपयुक्त
Calicut-171995 में जारी, अंडमान और निकोबार द्वीप4.37द्वीप की परिस्थितियां; अपने क्षेत्र के लिए उपयुक्तता जांचें
Mohitnagar1991 में जारी, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, केरल3.67तीन राज्यों के लिए सुझाई गई
  • ये सुझाई गई या केंद्र की पैदावार हैं। खेत की पैदावार उम्र, वर्षा और देखभाल से बदलती है, इसलिए हिसाब इनसे कम पर लगाएं। पौधे केवल CPCRI, राज्य कृषि या बागवानी विश्वविद्यालय या पंजीकृत नर्सरी से लें, और अपने KVK से पूछें कि आपकी घाटी के लिए कौन सी किस्म ठीक है।

रोपण और दूरी

  • दूरी: 2.7 x 2.7 मीटर, यानी लगभग 1,300 पेड़ प्रति हेक्टेयर (लगभग 526 पेड़ प्रति एकड़)।
  • गड्ढे: 60 x 60 x 60 सेमी। अच्छे जल निकास वाली मिट्टी में गहरा (लगभग 90 सेमी) और ऊंचे जलस्तर वाली भारी मिट्टी में उथला (लगभग 60 सेमी) लगाएं।
  • अंतरफसलें: 4थे साल से पेड़ों के बीच केला या कोको (2.7 x 5.4 मीटर); साल 6 से 8 से पेड़ की कतारों में काली मिर्च या पान की बेल। पेड़ों के छोटे रहते अंतरफसलें प्रति एकड़ आमदनी बढ़ाती हैं।

पोषण और सिंचाई

मदप्रति पेड़ प्रति वर्ष (पूरी खुराक)प्रति एकड़ (526 पेड़)प्रति हेक्टेयर (1,300 पेड़)
नाइट्रोजन100 ग्राम (लगभग 220 ग्राम यूरिया)लगभग 53 किलो130 किलो
फॉस्फोरस (P2O5)40 ग्राम (लगभग 200 ग्राम रॉक फॉस्फेट)लगभग 21 किलो52 किलो
पोटाश (K2O)140 ग्राम (लगभग 235 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश)लगभग 74 किलो182 किलो
  • उम्र के अनुसार: साल 1 में खुराक का एक तिहाई, साल 2 में दो तिहाई, साल 3 से पूरी खुराक। गोबर खाद हर साल दी जाती है; KAU प्रति पेड़ 10 से 12 किलो बताता है और CPCRI 20 किलो सुझाता है। उत्पाद के चुनाव के लिए उर्वरक देखें और पहले मिट्टी जांच कराएं।
  • पानी: सूखे मौसम में लगभग हर 3 से 5 दिन में करीब 175 लीटर प्रति पेड़ सिंचाई करें। पश्चिमी तट का कार्यक्रम है नवंबर और दिसंबर में हर 7 से 8 दिन, जनवरी और फरवरी में हर 6 दिन और मार्च से मई में हर 3 से 5 दिन। ड्रिप सिंचाई से पानी की खपत घट सकती है।

कीट और रोग

  • कोलेरोगा (फल सड़न): मानसून से पहले और दौरान साल में तीन बार 1% बोर्डो मिश्रण छिड़कें, या गुच्छों पर पॉलीथिन ढकें। संक्रमित दाने हटाकर जला दें।
  • पीला पत्ता रोग: कीट Proutista moesta से फैलने वाला फाइटोप्लाज्मा, जो कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़, शिवमोगा और चिकमगलूरु तथा केरल के कासरगोड में गंभीर है। पत्तियां सिरे से पीली होती हैं और बाद में सूख जाती हैं। सुझाए गए उपाय हैं रोगी पेड़ हटाना, मानक खुराक से ज्यादा पोटाश और मैग्नीशियम देना, Mangala जैसी सहनशील रोपण सामग्री चुनना, और केवल शुरुआती अवस्था में CPCRI या अपने KVK की विशेषज्ञ सलाह पर टेट्रासाइक्लिन छिड़काव व जड़ में सिंचन।
  • कलिका सड़न और तना आधार सड़न: कलिका सड़न में प्रभावित ऊतक हटाकर बोर्डो पेस्ट लगाएं; तना आधार सड़न वाले पेड़ों को खाइयों से अलग करें और कॉपर ऑक्सीक्लोराइड जैसे लेबल वाले फफूंदनाशक से जड़ में सिंचन करें।
  • कीट: स्पिंडल बग (इसके लिए अपने KVK या राज्य कृषि विभाग से अभी पंजीकृत उत्पाद पूछें और लेबल के हिसाब से चलें) और जड़ की सूंडी (मई और सितंबर से अक्टूबर में chlorpyrifos से सिंचन)। लेबल और अपने KVK की सलाह मानें; कीट देखें।
  • भंडारण: सुपारी का भृंग रखे हुए दानों में छेद करता है; दाने सूखे और साफ रखें।

कटाई, उत्पाद और पैदावार

  • पके दाने तोड़कर सुखाए और चाली (सूखी छिली सुपारी) में बदले जाते हैं; कच्चे दाने कलिपाक के लिए तोड़े जाते हैं, जो उबालकर बनाया उत्पाद है। खरीदार उत्पाद और ग्रेड के हिसाब से भाव देते हैं, इसलिए अपने व्यापारी से हर एक का भाव पूछें।
  • पूर्ण विकसित पेड़ किस्म के अनुसार प्रति वर्ष लगभग 2 से 4.6 किलो चाली देते हैं।
  • पेड़ लंबे जीवन के होते हैं और दशकों तक फल देते हैं। पहली फलत के वर्षों का कोई जांचा हुआ आंकड़ा नहीं मिला; अपनी किस्म के लिए CPCRI या अपने KVK से पूछें।
💡 सुझाव: रोपण से पहले आसपास पीला पत्ता रोग देखें। प्रभावित गांव में Mangala जैसी सहनशील किस्म चुनें और पोटाश व मैग्नीशियम पर्याप्त रखें।

लागत और कमाई

  • 3 अक्टूबर 2026 का भाव (Agmarknet, ACROP के जरिए): 20 मंडियों (463.7 टन आवक) में राष्ट्रीय मध्यक ₹37,578 प्रति क्विंटल, कर्नाटक (19 मंडियां) के लिए ₹31,070 प्रति क्विंटल, केरल (4 मंडियां) के लिए ₹38,750 और गोवा के लिए ₹38,200। सबसे कम शिकारीपुर में ₹21,218 और सबसे ज्यादा मुंबई में ₹63,250 था। ये मिली-जुली किस्मों और ग्रेड के मोडल भाव हैं, इसलिए आपका भाव उत्पाद और ग्रेड पर निर्भर करेगा।
  • पूर्ण फलत वाले एक एकड़ का हिसाब (उदाहरण): 526 पेड़ x 3 किलो चाली = 1,578 किलो। ₹212 प्रति किलो (सबसे कम मंडी) पर यह लगभग ₹3.3 लाख; ₹310 प्रति किलो (कर्नाटक मध्यक) पर लगभग ₹4.9 लाख। पैदावार केंद्र के आंकड़े हैं, इसलिए असली आमदनी कम होगी; कटाई, उबालने या सुखाने, सिंचाई, खाद और रोग नियंत्रण की मजदूरी घटाएं।
  • भाव का जोखिम: सुपारी के भाव सालों में बहुत ऊपर-नीचे हुए हैं, इसलिए आज का स्तर टिकने की योजना न बनाएं। अपने KVK या बागवानी कार्यालय से लागत का अनुमान लें और अपनी मजदूरी व इनपुट दरें जोड़ें।

बाजार और जोखिम

  • सुपारी APMC यार्ड, सहकारी समितियों और व्यापारियों के जरिए बिकती है। मांग मुख्यतः चबाने और पान मसाला व्यापार से आती है, इसलिए आयात नीति और व्यापार नियम भाव बदल सकते हैं।
  • मुख्य जोखिम: भाव में उतार-चढ़ाव, पीला पत्ता रोग, गीले सालों में फल सड़न और सूखे महीनों में पानी की कमी। अंतरफसल और दूसरी आमदनी एक भाव पर निर्भरता घटाती है।
  • बागवानी सहायता के लिए सब्सिडी खोजक, कर्ज के लिए किसान क्रेडिट कार्ड, रोज के भाव के लिए मंडी भाव और फसल बीमा देखें। भरोसा करने से पहले सुपारी के लिए मौजूदा MIDH या राज्य दर अपने बागवानी कार्यालय से पक्की करें।

स्रोत