पंगेसियस (धारीदार कैटफिश, Pangasianodon hypophthalmus, जिसे "पंगास" या "बासा" नाम से बेचा जाता है) भारत में मिट्टी के तालाबों में पाली जाती है, मुख्य रूप से आंध्र प्रदेश के कृष्णा और गोदावरी डेल्टा जिलों और पश्चिम बंगाल में। यह ज्यादा मात्रा और कम भाव वाली मछली है: आंध्र प्रदेश के खेतों के ICAR-CIFE सर्वे में लगभग 36 टन प्रति हेक्टेयर उपज मिली, लेकिन मुनाफा लगभग पूरी तरह चारे की लागत और खेत पर मिलने वाले उस भाव पर टिका है जो पहले गिर चुका है।
यह उन्हीं के लिए ठीक है जिनके पास उपयुक्त तालाब या पट्टा है, प्रति एकड़ चारे पर कई लाख रुपये की कार्यशील पूंजी है, और कोई व्यापारी या चारा कंपनी पूरी पैदावार खरीदने को तैयार है। शुरुआती सालों के बाद मुनाफा घटा है, इसलिए यह आसान कमाई वाली मछली नहीं है।
भारत में यह कहां पाली जाती है
- आंध्र प्रदेश: तालाब में पालन लगभग 2004 में शुरू हुआ और कृष्णा व पश्चिम गोदावरी जिले केंद्र बने। ICAR-CIFA के शोधकर्ताओं के अनुसार रकबा 2009-10 में लगभग 16,000 हेक्टेयर तक पहुंचा और भाव गिरने के बाद स्थिर हुआ, और कई फार्म ऐसे तालाबों पर बने जिन्हें झींगा रोग से नुकसान हुआ था या जो कार्प के लिए कम उपजाऊ थे।
- पश्चिम बंगाल: बीज (फिंगरलिंग) उत्पादन का बड़ा क्षेत्र, जिसने आंध्र प्रदेश के विस्तार को बीज दिया। छत्तीसगढ़ में भी पंगेसियस बीज तैयार होता है, और जलाशयों में केज कल्चर को राष्ट्रीय मत्स्य विकास बोर्ड (NFDB) ने बढ़ावा दिया है।
- जलवायु और पानी: गर्म पानी की मछली जो हवा में सांस लेती है और कार्प की तुलना में कम ऑक्सीजन और खराब पानी सह लेती है, लेकिन कम तापमान पर परजीवी और जीवाणु संक्रमण का खतरा बढ़ता है। यह कम खारे पानी में भी बढ़ती है।
प्रजाति और कानूनी जांच
- P. hypophthalmus एक विदेशी प्रजाति है जिसे 1990 के दशक के मध्य में थाईलैंड से बांग्लादेश के रास्ते लाया गया। यह देसी Pangasius pangasius से अलग है, हालांकि दोनों को कभी-कभी "पंगास" कहा जाता है।
- कुछ भागी हुई मछलियां प्राकृतिक जल में दर्ज हुई हैं। शुरू करने से पहले अपने राज्य मत्स्य विभाग से अनुमति और तालाब से मछली बाहर न जाने के नियम पूछें, और बाढ़ से बचाव के लिए तालाब और निकासी सुरक्षित रखें।
बीज डालना और पालन
- फिंगरलिंग की गुणवत्ता बार-बार की समस्या है। ICAR-CIFA अच्छे बीज की कमी, असंगत प्रबंधन और तनाव से होने वाले रोग को क्षेत्र की मुख्य चुनौतियों में गिनता है। ऐसी हैचरी या नर्सरी से खरीदें जो बैच रिकॉर्ड दे सके, और भरोसेमंद आपूर्तिकर्ता के लिए अपने KVK या मत्स्य विभाग से पूछें।
- बीज की संख्या तालाब की गहराई और हवा देने की व्यवस्था पर निर्भर करती है। CIFA शोधकर्ताओं का दिया एक पॉलीकल्चर संदर्भ कम खारे तालाबों में पंगेसियस और रोहू को 25,000 और 1,250 प्रति हेक्टेयर (10,000 और 500 प्रति एकड़) रखता है, लेकिन आंध्र प्रदेश के ज्यादातर किसान अकेली पंगेसियस पालते हैं। अपने तालाब की गहराई के हिसाब से घनत्व के लिए स्थानीय मत्स्य विस्तार अधिकारी से पूछें।
- किसान तालाब प्रबंधन में खेती का चूना, गोबर और प्रोबायोटिक इस्तेमाल करते हैं। सर्वे में ज्यादातर किसानों ने दो चरणों में चावल की भूसी और पेलेट चारा मिलाकर दिया, और कोई तय चारा कार्यक्रम नहीं था।
- पालन लगभग एक साल चलता है। लंबी अवधि लागत को उपज से तेज बढ़ाती है: CIFA की समीक्षा के अनुसार पालन अवधि बढ़ाने से उत्पादन में सिर्फ 4% बढ़त के लिए उत्पादन लागत 10% बढ़ी।
चारा
- चारा सबसे बड़ी लागत है। ICAR-CIFE के सर्वे (आंध्र प्रदेश, 2011-12) में चारा परिवर्ती लागत का लगभग 79% था: चावल की भूसी लगभग ₹2.84 लाख प्रति हेक्टेयर और पेलेट चारा लगभग ₹3.48 लाख प्रति हेक्टेयर। बीज परिवर्ती लागत का 12% था।
- छोटे किसान सस्ती भूसी पर और बड़े किसान पेलेट पर ज्यादा निर्भर थे। मछली के आकार के हिसाब से चारा देना और बर्बादी रोकना लागत घटाने का मुख्य तरीका है, इसलिए अपने पेलेट ब्रांड की चारा तालिका के लिए KVK या राज्य मत्स्य विभाग से पूछें।
स्वास्थ्य
- यह प्रजाति कार्प की तुलना में बड़ी संख्या में मरने के लिए कम संवेदनशील है, लेकिन फिंगरलिंग और छोटी मछलियां सबसे कमजोर होती हैं और परजीवी व जीवाणु संक्रमण होते हैं। खराब पानी और ठंडा मौसम खतरा बढ़ाते हैं।
- किसान प्रोबायोटिक और कभी-कभी एंटीबायोटिक इस्तेमाल करते हैं। केवल खाने की मछली के लिए मान्य उपचार लें, लेबल और विथड्रॉल अवधि का पालन करें, और किसी भी एंटीबायोटिक से पहले मत्स्य विभाग या मछली स्वास्थ्य प्रयोगशाला से सलाह लें।
कटाई और उपज
- मछली एक साल में लगभग 1 से 1.5 किलो की हो जाती है। किसान बाजार के हिसाब से बीज डालने और कटाई का समय बदलते हैं, और भाव अच्छा हो तो किस्तों में निकालते हैं।
- सर्वे की उपज: 2011-12 के आंध्र प्रदेश सर्वे में औसतन 36,314 किलो प्रति हेक्टेयर (लगभग 14.7 टन प्रति एकड़), जिसमें छोटे और बड़े फार्म लगभग बराबर थे।
- CIFA की 2021 की समीक्षा राज्य में सामान्य उत्पादन स्तर लगभग 35 टन प्रति हेक्टेयर बताती है।
लागत और कमाई
| मद (आंध्र प्रदेश, प्रति हेक्टेयर) | 2011-12 सर्वे (ICAR-CIFE) |
|---|---|
| उपज | 36,314 किलो |
| कुल लागत (परिवर्ती और स्थिर, जमीन के किराए के मूल्य सहित) | ₹9.44 लाख |
| उत्पादन लागत | ₹25.67 प्रति किलो |
| खेत पर भाव | ₹37.97 प्रति किलो |
| कुल आय | ₹13.81 लाख |
| शुद्ध आय | ₹4.38 लाख (लगभग ₹1.77 लाख प्रति एकड़) |
- ये 2011-12 के आंकड़े हैं; तब से लागत काफी बढ़ी है। CIFA की 2021 की समीक्षा आंध्र प्रदेश में 35 टन प्रति हेक्टेयर पर उत्पादन लागत ₹65 से ₹70 प्रति किलो बताती है, यानी लगभग ₹22.75 से ₹24.5 लाख प्रति हेक्टेयर (₹9.2 से ₹9.9 लाख प्रति एकड़)। यह भी बताती है कि मुनाफे का margin 2004 में 54% से घटकर 2019 में 18% रह गया, और COVID के दौरान 9% का घाटा हुआ।
- अपने तालाब का हिसाब: उपज (किलो) x खेत का भाव, घटाइए चारा, बीज, चूना और प्रोबायोटिक, मजदूरी, कटाई का खर्च, तालाब का किराया या कर्ज का ब्याज और बिजली। ₹65 से ₹70 प्रति किलो की लागत पर इससे नीचे का भाव घाटा देता है। बीज डालने से पहले व्यापारियों से आज का भाव लें।
- दोनों सर्वे आंध्र प्रदेश के हैं। दूसरे राज्यों के लिए कोई सत्यापित ताजा आंकड़ा नहीं मिला, इसलिए स्थानीय पंगेसियस किसानों और मत्स्य विभाग से पूछें।
बाजार और जोखिम
- बाजार पूर्वोत्तर से शुरू होकर उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र तक फैला, और दिल्ली का गाजीपुर एक बड़े व्यापार केंद्र के रूप में बताया गया है। यह कम भाव की सफेद मछली के रूप में बिकती है, इसलिए खरीदार व्यापारी और स्थानीय मछली बाजार हैं, और निर्यात प्रोसेसर कम।
- 2009 से 2011 के बीच ज्यादा आपूर्ति से भाव आधे से भी ज्यादा गिरे और कई छोटे किसान बाहर हो गए। कुछ चारा निर्माता अब अपने ग्राहकों से अनुबंध या अर्ध-अनुबंध खेती में मछली वापस खरीदते हैं, जिससे बाजार पक्का हो सकता है पर आप एक चारा आपूर्तिकर्ता से बंध जाते हैं।
- मुख्य जोखिम: चारे के भाव में बढ़ोतरी, फिंगरलिंग की गुणवत्ता, कटाई के समय भाव गिरना, ठंड में रोग, और बाढ़ जिससे मछली बाहर निकल सकती है।
वित्त और सहायता
- तालाब और केज के लिए प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना और NFDB की सहायता के बारे में जिला मत्स्य अधिकारी से पूछें; पंगेसियस के लिए कोई मौजूदा दर यहां सत्यापित नहीं हुई है।
- देखें KCC, जो मत्स्य पालन की कार्यशील पूंजी भी देता है, सब्सिडी खोजक, एरेटर और पंप के लिए सोलर पंप, और समूह में बिक्री व चारा खरीद के लिए FPO।
स्रोत
- Mugaonkar, Kumar and Biradar, Economics and determinants of pangas catfish production in India, Fishery Technology 56 (2019), ICAR-CIFE
- Seshagiri et al., Sustainability of striped catfish culture in Andhra Pradesh, India, Int. J. Fisheries and Aquatic Studies 9(2), 2021 (ICAR-CIFA)
- Global Seafood Alliance, Pangasius aquaculture in India (2017)
