पामारोजा गर्म, सूखे से मध्यम नम इलाकों के लिए एक वास्तविक, कम लागत वाली सुगंधित घास की फसल है, और यह वहाँ भी टिकती है जहाँ कई फसलें फेल हो जाती हैं, लेकिन कमाई तेल में है, इसलिए रोपने से पहले आसवन इकाई और खरीदार चाहिए। भाव इसकी कमजोर कड़ी है: मार्च 2026 में धर्मपुरी (तमिलनाडु) के उत्पादकों ने तेल का स्थानीय भाव लगभग ₹4,000 प्रति किलो बताया जबकि उत्पादन लागत लगभग ₹9,000 प्रति किलो थी, और वहाँ का क्षेत्र पाँच साल में लगभग 1,450 एकड़ से घटकर 410 एकड़ रह गया।

विस्तार स्रोत खेत स्तर पर 75 से 125 किलो प्रति हेक्टेयर तेल उपज बताते हैं; अनुसंधान केंद्र 250 किलो या उससे ज्यादा तक पहुँचते हैं। योजना कम आँकड़े पर बनाएँ।

भारत में कहाँ उगता है

  • जंगली और खेती: पामारोजा मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और ओडिशा में जंगली उगता है, और भारत में 50 साल से ज्यादा समय से तेल निकाला जा रहा है, ज्यादातर जंगली झुरमुटों से। KAU केंद्र के एक नोट में भारत का वार्षिक तेल उत्पादन 60 से 70 टन बताया गया है (पुराना आँकड़ा)।
  • आज की खेती: तमिलनाडु में धर्मपुरी और हरूर (350 से 400 छोटी आसवन इकाइयाँ), महाराष्ट्र का मराठवाड़ा (नांदेड़ में KVK प्रदर्शन), और उत्तराखंड व उत्तर प्रदेश में CSIR-CIMAP के परीक्षण स्थल।
  • जलवायु: गर्म, नम से सूखे उष्णकटिबंधीय इलाके का पौधा। पाले से नुकसान होता है। Motia प्रकार 800 से 900 मिमी वर्षा वाली खुली, अच्छे जल-निकास वाली सूखी ढलानों पर उगता है।
  • मिट्टी: सबसे अच्छा लगभग उदासीन pH पर, पर pH 9 तक की क्षारीय मिट्टी में भी आर्थिक उपज देता है। रुका हुआ पानी नहीं सह सकता।

किस्में

CSIR-CIMAP का Pantnagar में दो साल का परीक्षण (दोमट रेतीली मिट्टी, pH 7.4, साल में चार कटाई, 60 x 30 सेमी):

किस्मस्रोतविशेषताएँउपयुक्त क्षेत्र
CIMAP-HarshCSIR-CIMAP, 2010Pantnagar परीक्षण में तेल 0.71%, शाक 398.6 क्विंटल/हेक्टेयर/वर्ष, तेल 283 किलो/हेक्टेयर/वर्ष; जेरेनियोल 88.6%तराई, उत्तराखंड (परीक्षण); दूसरी जगह स्थानीय जाँच के बाद ही आजमाएँ
PRC-1Palmarosa Research Centre की लाइनतेल 0.70%; तेल 262 किलो/हेक्टेयर/वर्ष; जेरेनियोल 83.1%वही परीक्षण
TrishnaCSIR-CIMAPसबसे ऊँची (185 सेमी); तेल 0.69%; तेल 237 किलो/हेक्टेयर/वर्ष; जेरेनियोल 75.9%वही परीक्षण
Tawirosa, CN-5, CK-10अन्य जारी लाइनेंतेल उपज 142 से 184 किलो/हेक्टेयर/वर्ष; CK-10 में केवल 0.37% तेलउसी परीक्षण में कम

ये पूरे उर्वरक और चार कटाई वाले अनुसंधान केंद्र के नतीजे हैं। खेत के नतीजे कम होते हैं। CSIR-CIMAP या अपने KVK से पूछें कि आपके जिले में कौन सी किस्म परखी गई है और उसमें तेल कितना है, क्योंकि खरीदार तेल की गुणवत्ता पर भुगतान करता है।

रोपण सामग्री और दूरी

  • प्रवर्धन: बीज या स्लिप से। नर्सरी क्यारियों में बीज मई में बोएँ; Pantnagar परीक्षण में जुलाई के पहले पखवाड़े में 35 दिन की पौध रोपी गई। लगभग 15 सेमी ऊँची पौध रोपें।
  • दूरी: पंक्ति और पौधे के बीच 20 से 60 सेमी, उपजाऊ मिट्टी में ज्यादा। परीक्षण में 60 x 30 सेमी रखा गया, जो लगभग 22,500 पौधे प्रति एकड़ (55,500 प्रति हेक्टेयर) है।
  • बरसात की शुरुआत में रोपें, क्योंकि छोटी पौध दीमक और जलभराव के सामने कमजोर होती है।

पोषण और सिंचाई

  • KAU की सिफारिश: रोपाई से पहले 10 टन प्रति हेक्टेयर (4 टन प्रति एकड़) FYM; आधार में 20 किलो N, 50 किलो P2O5 और 40 किलो K2O प्रति हेक्टेयर (लगभग 8, 20 और 16 किलो प्रति एकड़), और दो बार में 40 किलो N प्रति हेक्टेयर (16 किलो प्रति एकड़)। हर साल नई पत्तियाँ आने पर NPK दोहराएँ।
  • CIMAP परीक्षण की मात्रा: 150 किलो N, 80 किलो P2O5 और 60 किलो K2O प्रति हेक्टेयर (लगभग 61, 32 और 24 किलो प्रति एकड़), N पाँच बार में: पाँचवाँ हिस्सा आधार में, पाँचवाँ 35 दिन पर, और बाकी हर कटाई के बाद।
  • पानी: फसल वर्षा आधारित हो सकती है, पर गर्मी में 10 से 14 दिन के अंतर पर सिंचाई से उपज बढ़ती है। विस्तार रिपोर्टों में सिंचित खेत 100 से 125 किलो तेल प्रति हेक्टेयर देते हैं, जबकि वर्षा आधारित में कम। ड्रिप सिंचाई देखें।

कीट और रोग

  • KAU द्वारा सूचीबद्ध कीट: कोपलों और फूल के सिरों पर माहू और थ्रिप्स, सफेद लट (जून से नवंबर) और दीमक, जो नई रोपी पौध को मार देती है।
  • रोग: Ellisiella झुलसा और Curvularia धब्बा (UP, MP, बिहार, कर्नाटक और J&K में अगस्त से अक्टूबर में सबसे ज्यादा)।
  • पुरानी सिफारिशों में ऐसे रसायनों के नाम हैं जो बाद में प्रतिबंधित या सीमित हो गए। छिड़काव से पहले वर्तमान लेबल देखें और अपने KVK से पूछें; रिकॉर्ड रखें, क्योंकि तेल सौंदर्य प्रसाधनों में जाता है। कीट देखें।

कटाई, आसवन और उपज

  • कटाई की अवस्था: बीज बनना शुरू होने पर, फूल आने के 10 से 15 दिन बाद। जमीन से लगभग 10 सेमी ऊपर काटें।
  • कटाई की संख्या: पहले साल एक या दो, फिर हर 70 से 80 दिन पर, यानी साल में 3 से 4 कटाई। Pantnagar परीक्षण में तीन महीने के अंतर पर साल में चार कटाई ली गईं।
  • फसल की उम्र: 4 से 6 साल उत्पादक रहती है; तीसरे या चौथे साल से घास और तेल की उपज घटने लगती है। पहले साल तेल उपज कम होती है।
  • घास की उपज: प्रति कटाई 6 से 10 टन प्रति हेक्टेयर (2.4 से 4 टन प्रति एकड़)।
  • आसवन: कटी घास को छाया में 24 से 48 घंटे मुरझाने दें, फिर आसवन करें। भाप आसवन से जल आसवन की तुलना में ज्यादा और बेहतर तेल मिलता है। शाक में तेल लगभग 0.4 से 0.5% है (फूलों में 0.52% तक)।
  • तेल उपज: औसतन 100 से 125 किलो प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष (40 से 50 किलो प्रति एकड़); अच्छे प्रबंधन में 250 किलो प्रति हेक्टेयर असामान्य नहीं। नांदेड़ के एक प्रदर्शन (2023 से 2025, 1.2 हेक्टेयर) में 75 से 100 किलो प्रति हेक्टेयर मिला।

लागत और आमदनी

  • भाव: मुंबई और हैदराबाद बाजारों में ₹3,400 से ₹3,500 प्रति किलो (2023 से 2025, एक KVK रिपोर्ट के अनुसार), और मार्च 2026 में धर्मपुरी में स्थानीय रूप से लगभग ₹4,000 प्रति किलो (उत्पादकों के अनुसार दूसरे बाजारों में लगभग दोगुना)। तेल के भाव इत्र व्यापार के साथ घटते-बढ़ते हैं, इसलिए ताजा भाव पूछें।
  • नांदेड़ प्रदर्शन की लागत (प्रति हेक्टेयर): पहले साल ₹60,000 से ₹70,000, उसके बाद हर साल ₹25,000 से ₹30,000, और आसवन सहित कुल ₹1.4 से ₹1.5 लाख। बताई गई कुल आमदनी ₹2.62 से ₹3.5 लाख और शुद्ध ₹1.22 से ₹2 लाख प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष। प्रति एकड़ यह लगभग ₹1.06 से ₹1.4 लाख कुल आमदनी है।
  • हिसाब: 75 किलो x ₹3,500 = ₹2.6 लाख प्रति हेक्टेयर; 125 किलो x ₹3,500 = ₹4.4 लाख। अगर आपकी लागत ज्यादा है, जैसा धर्मपुरी के उत्पादकों ने कच्चे माल, मजदूरी और ढुलाई सहित ₹9,000 प्रति किलो तेल बताया, तो ₹4,000 के भाव पर घाटा होता है। आसवन का ईंधन और मजदूरी, और इकाई तक की दूरी, मुनाफा तय करते हैं।
💡 सुझाव: रोपने से पहले आसवन की व्यवस्था (अपनी इकाई, पड़ोसी की या किराये की इकाई) और खरीदार का हाल का भाव लिखित में पक्का कर लें। जो घास एक-दो दिन में आसवित नहीं हो पाती उसका तेल घट जाता है।

बाजार और जोखिम

  • तेल इत्र, सौंदर्य प्रसाधन, साबुन और फ्लेवर के व्यापारियों को बिकता है; जेरेनियोल की मात्रा ग्रेड तय करती है। बिक्री आमतौर पर मुंबई और हैदराबाद के व्यापारियों और बिचौलियों के जरिए होती है, जिससे उत्पादक की मोलभाव की ताकत सीमित रहती है।
  • धर्मपुरी में घटते क्षेत्र का कारण वर्षा आधारित खेतों में अनियमित बारिश, कमजोर और असंगठित मांग, और बिचौलियों पर निर्भरता बताई गई। वहाँ कई आसवन बॉयलर 40 से 50 साल पुराने हैं।
  • समूह आसवन इकाई साझा कर सकते हैं और FPO से मिलकर बेच सकते हैं। सुगंधित फसलों के लिए CSIR Aroma Mission और NMPB के तहत सहायता है; पामारोजा की कोई सत्यापित वर्तमान दर नहीं मिली, इसलिए सब्सिडी खोजक और अपना KVK देखें।

स्रोत