मड क्रैब (कीचड़ केकड़ा) की मोटाई खारे ज्वारीय पानी में चलती है, और भारत में सबसे अच्छी तरह दर्ज इलाका पश्चिम बंगाल का सुंदरबन है, यानी उत्तर और दक्षिण 24 परगना। इसमें जंगल से पकड़े गए कमजोर केकड़े (नरम खोल वाले, या अविकसित अंडाशय वाली मादाएँ) खरीदकर 15 से 30 दिन जाल के बाड़ों, तालाबों या अलग-अलग डिब्बों में रखे जाते हैं, जब तक खोल सख्त न हो जाए, मांस न भर जाए या अंडाशय पक न जाए। इसके लिए ज्वार वाला पानी, रोज सस्ती ताजा मछली की आपूर्ति और जीवित केकड़े के निर्यात कारोबार में एक खरीदार चाहिए; इसमें न पेलेट चारा खरीदना पड़ता है और न हैचरी के बीज का इंतजार करना पड़ता है।
जोखिम हैं गर्मी में मौत, मछली पकड़ने वाली नावों से खरीदा बीमार या तनावग्रस्त माल, चोरी और कोलकाता से उड़ानों से जुड़े भाव के उतार-चढ़ाव। नीचे के सभी भाव 2018 के एक क्षेत्र अध्ययन और 2019 में छपी CIBA सामग्री से हैं, इसलिए पैसा लगाने से पहले कोलकाता के किसी निर्यातक से आज के भाव पूछ लें।
भारत में कहाँ होता है
- पश्चिम बंगाल का सुंदरबन: मोटाई, जिसे स्थानीय भाषा में "चैंबर चास" कहते हैं, 1990 के दशक के अंत से उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना और पूर्व मेदिनीपुर के खारे पानी वाले इलाकों में होती है, और वहाँ केकड़ा पालन का मुख्य रूप यही है। गोसाबा, बसंती, मिनाखान, हिंगलगंज, हसनाबाद और संदेशखाली मोटाई वाले नामित इलाके हैं।
- प्रजाति: हरा कीचड़ केकड़ा Scylla serrata (1.5 से 2 किलो से ऊपर जा सकता है) और नारंगी कीचड़ केकड़ा S. olivacea (अधिकतम लगभग 1.2 किलो)। ICAR-CIBA के अनुसार भारत में S. serrata ज्यादा पाई जाती है, उसके बाद S. olivacea; सुंदरबन की मत्स्य में S. olivacea हावी है।
- अन्य जगह: ICAR-CMFRI का एक पुराना शोधपत्र (2001) प्रायद्वीपीय भारत के दक्षिणी राज्यों में पालन बताता है और मोटाई को ग्रो-आउट से ज्यादा लाभदायक पाता है। दूसरे तटों के खेत स्तर के आँकड़े कम हैं, इसलिए स्थानीय मत्स्य कार्यालय से पास के मोटाई करने वालों के नाम पूछकर उनके यहाँ जाएँ।
- पानी और जगह: उदाहरण वाले खेत नदियों के संगम पर ज्वार के पानी पर हैं, इसलिए ज्वार रोज पानी बदल देता है। गर्मी में केकड़ों की ज्यादा मौत के लिए तैयार रहें।
इस्तेमाल होने वाली प्रणालियाँ
| प्रणाली | कैसे काम करती है | दर्ज उदाहरण |
|---|---|---|
| मिट्टी के चैंबर | ज्वार से भरने वाले बाड़े, मजबूत जाल और बाँस की फट्टियों से तली से 1.8 मीटर ऊँचाई तक घिरे; नर और मादा अलग-अलग रखे जाते हैं | 160 से 180 वर्ग मीटर के नौ चैंबर, 1.2 मीटर गहरे, प्रति चैंबर 100 किलो केकड़े; एक और खेत में 240 से 600 वर्ग मीटर के चैंबर हैं जिनमें 0.45 मीटर गहराई पर ज्वार से पानी बदलता है |
| अलग-अलग डिब्बे | तालाब में तैरते राफ्ट पर छेद वाले प्लास्टिक डिब्बे में एक-एक मादा, जिससे आपस में खाना रुकता है और हर केकड़े पर नजर और अलग चारा संभव है | 3,000 वर्ग मीटर का तालाब, 33.5 सेमी लंबाई के डिब्बे ₹200 प्रति नग, 7,000 डिब्बे उपयोग में; डिब्बे की उम्र 6 से 7 साल |
CIBA बताता है कि डिब्बा पद्धति में पूँजी ज्यादा लगती है, सतह पर तैरते डिब्बे गर्म होते हैं और उन पर शैवाल जमता है, और डिब्बों में केकड़े दिन में एक बार खाते हैं जबकि खुले तालाब में दो बार। गर्म दिनों में डिब्बों को डुबोने के लिए विकसित पंप से चलने वाला डूबने वाला ढाँचा भी CIBA ने बताया है।
केकड़ों का चुनाव और खरीद
- 8 से 14 सेमी कैरापेस चौड़ाई के जीवित, पूरे केकड़े खरीदें जिन्हें निर्यात कारोबार कमजोर होने से नहीं लेता। नरम खोल वाली और अविकसित अंडाशय वाली मादाएँ, और हाल में खोल बदले हुए नर चुनें जिन्हें अपना खोल भरना है।
- 2018 में सुंदरबन के बाजारों में खरीद के आम भाव: नर 100 से 150 ग्राम के ₹300 से ₹350 प्रति किलो, 400 से 500 ग्राम के ₹450 से ₹700 प्रति किलो; मादाएँ 150 से 200 ग्राम की ₹350 से ₹450 प्रति किलो और 200 ग्राम से ऊपर की ₹500 से ₹600 प्रति किलो।
- जो केकड़े मछुआरों की नावों पर 3 से 4 दिन रहे हों उनसे बचें, क्योंकि तनावग्रस्त केकड़े जल्दी संक्रमित होते हैं, और टूटे या बिना पंजे वाले केकड़े भी न लें।
- जंगली केकड़ों पर ज्यादा निर्भरता जंगली आबादी के लिए खतरा है। CIBA के अनुसार हैचरी बीज मौजूद है पर लार्वा की उत्तरजीविता अस्थिर है, इसीलिए खेत अब भी जंगली माल पर निर्भर हैं।
संग्रहण, चारा और पानी
- चैंबर में संग्रहण: 200 से 500 ग्राम के नर और 150 से 250 ग्राम की मादाएँ, लगभग 100 किलो केकड़े प्रति 160 से 240 वर्ग मीटर चैंबर (करीब 250 से 300 नर या 450 मादाएँ)। यह लगभग 0.4 से 0.6 किलो प्रति वर्ग मीटर है।
- डिब्बों में संग्रहण: प्रति डिब्बा एक केकड़ा; बंगाल के डिब्बे वाले उदाहरण में 150 से 180 ग्राम की मादाएँ।
- चारा: ताजी कटी हुई कम कीमत की मछली जैसे Johnius, Setipinna, Coilia और कभी-कभी तिलापिया, साथ में घोंघे, रोज शरीर के वजन का 5 से 10% (खेतों के आँकड़े 8 से 10%)। 2018 में मछली ₹20 से ₹40 प्रति किलो थी। बचा हुआ चारा निकालें और सड़ी मछली न दें।
- कटाई तक का समय: चैंबर वाले उदाहरण में गर्म महीनों में 15 से 16 दिन और नवंबर से फरवरी या मार्च तक लगभग 25 दिन; कुल मिलाकर 20 से 30 दिन (CIBA); डिब्बों में सुंदरबन के केकड़ों को 25 दिन और गुजरात से लाए केकड़ों को 42 से 45 दिन लगे।
- वजन बढ़त: 200 ग्राम का केकड़ा एक महीने में 25 से 50 ग्राम बढ़ता है; चैंबर के केकड़े 40 से 50 ग्राम बढ़े; डिब्बे की मादाएँ 25 से 30 ग्राम बढ़ीं।
- पानी की देखभाल: ज्वार के साथ पानी बदलें (एक तालाब में पूर्णिमा और अमावस्या पर 20%), फसलों के बीच चूना या डोलोमाइट डालें, तली को खुरचें, और केकड़े जाल पर चढ़ें तो ऑक्सीजन दें। दो फसलों के बाद एक किसान चैंबर सुखाकर मिट्टी में चूना और जिओलाइट मिलाकर बदबूदार गैसें हटाता है। उत्पादों और मात्रा के लिए अपने मत्स्य अधिकारी या CIBA काकद्वीप की सलाह मानें। चक्रवात या भारी बारिश से पहले मौसम देखें।
- मौसम: उदाहरण वाले खेतों में अप्रैल से जून को छोड़कर लगभग पूरे साल, यानी साल में करीब 9 से 10 महीने मोटाई चलती है (CIBA)। सर्दियों में भाव ज्यादा रहते हैं।
कटाई और उत्तरजीविता
- बाजार के लिए तैयार स्वस्थ केकड़े सुबह जल्दी निर्यातक को पहुँचाए जाते हैं। उदाहरण में मोटे किए गए नर 500 से 700 ग्राम और मादाएँ 250 से 300 ग्राम की थीं।
- चैंबर के मुनाफे की गणना में 90% और डिब्बों की गणना में 80% उत्तरजीविता मानी गई; असल में गर्मी में यह घट जाती है।
- बीमारियों का इलाज यहाँ शामिल नहीं है: माल साफ रखें, मरे केकड़े तुरंत निकालें, और मौत शुरू होने पर CIBA काकद्वीप या मत्स्य कार्यालय से सलाह लें।
लागत और आमदनी
नीचे के सभी आँकड़े जुलाई से अगस्त 2018 के खेत साक्षात्कारों से हैं, किसी ट्रायल से नहीं, और किसी में जमीन, मजदूरी या चैंबर बनाने का खर्च शामिल नहीं है। बाड़ा, तालाब और डिब्बों की लागत जगह के अनुसार बदलती है, इसलिए योजना से पहले कोटेशन लें।
| मामला (2018) | लगाया गया माल | बिक्री | बताया गया मुनाफा |
|---|---|---|---|
| चैंबर, 100 किलो डाले, 15 दिन | केकड़े ₹300 से ₹500 प्रति किलो पर | 90 किलो ₹650 से ₹800 प्रति किलो पर (सर्दी में ₹900) | ₹9,000 से ₹24,000 प्रति फसल |
| डिब्बे, 640 वर्ग मीटर में 500 मादाएँ, 45 दिन | 150 से 180 ग्राम की मादाएँ ₹300 से ₹350 प्रति किलो पर | 80% बचकर 180 से 200 ग्राम की हुईं; आमदनी ₹57,600 | ₹22,600 शुद्ध प्रति फसल |
चैंबर के आँकड़ों से उदाहरण: ₹400 पर 100 किलो खरीदना ₹40,000 है; 15 दिन तक शरीर के वजन का 10% चारा लगभग 150 किलो मछली ₹30 पर यानी ₹4,500; 90 किलो ₹700 पर बेचने से ₹63,000। इससे मजदूरी, चूना और चैंबर के खर्च से पहले लगभग ₹18,500 बचते हैं, जो किसान के बताए ₹9,000 से ₹24,000 के भीतर है। डिब्बे धीमे हैं: ₹200 प्रति डिब्बे के हिसाब से 500 डिब्बे तालाब से पहले ही ₹1 लाख के हैं। एक डिब्बे वाले किसान ने नवंबर से जनवरी में मादाओं के लिए ₹1,800 से ₹2,100 प्रति किलो बताया, यह चरम भाव है जिस पर योजना नहीं बनानी चाहिए।
बाजार और बिक्री
- मोटे किए गए केकड़े मुख्यतः निर्यात कारोबार में जाते हैं: 2018 में कोलकाता के आसपास नौ निर्यातक थे जो सिंगापुर, मलेशिया और चीन को जीवित केकड़े भेजते थे। कई खेत सीधे निर्यातक को बेचते हैं, कभी कैनिंग मछली बाजार के नीलामी स्थल के जरिए, और कुछ बिचौलियों के जरिए।
- निर्यातक मौजूदा निर्यात बाजार के हिसाब से ग्रेड के अनुसार भाव तय करते हैं। CIBA अमेरिकी डॉलर प्रति किलो में बताता है: 1 किलो से ऊपर के नर और 900 ग्राम से ऊपर की अंडे वाली मादाएँ लगभग 22 से 24, 700 ग्राम से ऊपर 17 से 18, 500 ग्राम से ऊपर 13 से 14, 400 ग्राम से ऊपर 11 से 12 और 300 ग्राम से ऊपर 8 से 9। एक पंजा खोए केकड़े अक्सर लौटा दिए जाते हैं।
- जब कोलकाता से उड़ानें अनियमित होती हैं, व्यापारी जीवित केकड़े 2 से 4 दिन रोक लेते हैं और मोटाई करने वालों को ₹150 से ₹200 प्रति किलो कम देते हैं।
- ऐसी किसी योजना में न फँसें जो तय खरीद भाव का वादा करे या गारंटीशुदा रिटर्न के साथ डिब्बे बेचे; निर्यातक की ग्रेड सूची और लिखित ऑर्डर माँगें। किसान उत्पादक समूह (FPO) बेहतर मोलभाव कर सकता है; देखें निर्यात खरीदार।
वित्त और अनुमतियाँ
मत्स्य पालन के लिए किसान क्रेडिट कार्ड से कर्ज मिल सकता है, और सब्सिडी फाइंडर केंद्र की योजनाएँ बताता है। सब्सिडी दरें बदलती रहती हैं, इसलिए केकड़ा मोटाई के लिए मौजूदा सहायता जिला मत्स्य अधिकारी से पूछें, और यह भी कि आपके तालाब को खारे पानी की जलकृषि के लिए पंजीकरण चाहिए या नहीं और राज्य के नियम आकार या अंडे वाली मादा पकड़ने पर रोक लगाते हैं या नहीं।
Sources
- Fattening of mud crab Scylla serrata in estuarine region of south-eastern West Bengal, Subrato Ghosh, Aquaculture Asia, Jan-Mar 2019
- Mud crab farming: An alternative livelihood in the Indian Sundarban, ICAR-CIBA Kakdwip, Aquaculture Asia, 2019
- Optimisation of nursery rearing for megalopa of giant mud crab, ICAR-CIBA, Indian Journal of Fisheries, 2019
- The aquaculture of Scylla species in India, Marichamy and Rajapackiam, Asian Fisheries Science, 2001 (ICAR-CMFRI)
