मल्लिका (Mallika) बिना रेशे वाला, बड़े फल का आम का संकर (Neelum x Dashehari) है जिसे ICAR-IARI, नई दिल्ली ने जारी किया, और यह देर से पकने वाली किस्म है: मैदानों में फल जुलाई के आखिर से अगस्त तक पकता है, और हिमाचल प्रदेश की निचली पहाड़ियों में अगस्त के दूसरे से तीसरे हफ्ते में तैयार होता है। यह उन किसानों के लिए ठीक है जो अपना आम का मौसम बढ़ाना चाहते हैं; ज्यादा पेड़ लगाने से पहले अपने KVK से स्थानीय उपज के रिकॉर्ड पूछ लें।
देर से पकना इसकी मुख्य खासियत है; आपको मिलने वाला भाव इस पर निर्भर करेगा कि स्थानीय बाजार में देर से आने वाले, बड़े, बिना रेशे के आम की कितनी मांग है।
भारत में यह कहां उगता है
- ICAR-IARI के अनुसार संकर किस्मों की बड़े पैमाने पर पौध तैयारी और रोपण 1970 के दशक में मल्लिका और आम्रपाली से शुरू हुआ, और मल्लिका कई कृषि-पारिस्थितिकी इलाकों में उगाई जाती है तथा कर्नाटक और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में लोकप्रिय हो गई है।
- हिमाचल प्रदेश में यह निचली शिवालिक पहाड़ियों (400 से 1,000 मीटर) की नई लाई गई किस्म है, जहां हमीरपुर के पास 2004 से 2007 में ट्रायल चले और किसानों ने इसे इसलिए पसंद किया कि फल तब पकता है जब देश के ज्यादातर आम खत्म हो चुके होते हैं।
- मिट्टी और जलवायु: TNAU का आम का पैकेज pH 6.5 से 8.0 और अच्छे जल निकास वाली लाल दोमट मिट्टी को सबसे अच्छा बताता है, जो मल्लिका के लिए भी ठीक है। जलभराव वाली जमीन से बचें।
किस्म की जानकारी
| गुण | बताया गया मान | स्रोत |
|---|---|---|
| जनक और संस्था | Neelum x Dashehari, ICAR-IARI, नई दिल्ली | NHB; ICAR Indian Horticulture |
| फल | बड़ा, लंबा-अंडाकार, पीले से नारंगी रंग का, बिना रेशे का, भंडारण गुण अच्छा, गूदा सख्त, ज्यादातर खाने का फल | NHB; ICAR Indian Horticulture |
| फल का वजन | 350 से 480 ग्राम; हिमाचल ट्रायल में अगस्त के दूसरे हफ्ते में करीब 417 ग्राम | ICAR Indian Horticulture; Indian J. Hort. 2010 |
| पकने का समय | जुलाई के आखिर से अगस्त के पहले हफ्ते तक; हिमाचल की निचली पहाड़ियों में अगस्त का दूसरा से तीसरा हफ्ता | ICAR Indian Horticulture; Indian J. Hort. 2010 |
| पेड़ और फलन | अर्ध-बौना, घनी रोपाई के लिए ठीक; भरपूर और नियमित फलने वाला बताया गया | ICAR Indian Horticulture; Indian J. Hort. 2010 |
- फलन की यह बात ICAR और हिमाचल के विश्वविद्यालय के वर्णनों से ली गई है; ज्यादा पेड़ लगाने से पहले अपने KVK या पास के किसी उत्पादक से पूछें कि आपके इलाके में यह कैसा फला है।
- कलमी पौधे ICAR संस्थान, राज्य कृषि विश्वविद्यालय या मान्यता प्राप्त नर्सरी से लें; लेबल और मातृ पेड़ का स्रोत पूछें।
रोपाई और दूरी
- सामान्य: TNAU हर तरफ 7 से 10 मीटर और 1 मीटर x 1 मीटर x 1 मीटर के गड्ढे बताता है, जिसमें प्रति गड्ढा 10 किलो गोबर की खाद और 100 ग्राम फॉस्फोरस डालें। 10 मीटर x 10 मीटर पर प्रति एकड़ 40 पेड़ (प्रति हेक्टेयर 100) आते हैं।
- घनी रोपाई: TNAU 5 मीटर x 5 मीटर (प्रति हेक्टेयर 400, प्रति एकड़ करीब 162) बताता है। ICAR का Indian Horticulture लेख उत्तर भारत में 5 मीटर x 5 मीटर को घनी रोपाई कहता है और बताता है कि नियमित फलने वाली, बौनी और छंटाई पर अच्छा जवाब देने वाली किस्में इसके लिए ठीक हैं; वह मल्लिका को अर्ध-बौना और घनी रोपाई के लिए ठीक बताता है।
- घने बागों में नियमित छंटाई और छत्र पर नियंत्रण चाहिए, क्योंकि पेड़ों की उम्र बढ़ने पर भीड़ और छांव से उपज और गुणवत्ता घटती है। अति घनी रोपाई (2.5 मीटर x 2.5 मीटर) आम्रपाली के लिए बताई गई है, मल्लिका के लिए नहीं।
खाद, फूल और पानी
- खाद और उर्वरक (TNAU, प्रति पेड़, सामान्य दूरी): पहले साल 10 किलो गोबर की खाद, 0.20 किलो N, 0.20 किलो P और 0.30 किलो K; छह साल तक हर साल उतनी ही मात्रा और जोड़ें; छठे साल से 50 किलो खाद, 1.0 किलो N, 1.0 किलो P और 1.5 किलो K। मिट्टी जांच के हिसाब से बदलें; देखें fertilizers।
- फूल लाना: Indian Horticulture बताता है कि छंटाई के बाद बने कल्ले एक साल तक फल रहित रह सकते हैं, इसलिए paclobutrazol (प्रति पेड़ 4 ग्राम मिट्टी में, 15 से 20 लीटर पानी में घोलकर, तने से 1.5 से 2 मीटर दूर के घेरे में, फूल आने से करीब 90 से 100 दिन पहले, यानी सितंबर में) इस्तेमाल होता है। सिर्फ KVK की सलाह पर और लेबल के हिसाब से इस्तेमाल करें।
- सिंचाई: जून से सितंबर में बारिश से करीब 30 से 40% पानी की जरूरत पूरी होती है, और अक्टूबर से मई में 60 से 70% सिंचाई से देना पड़ता है; पानी की कमी हो तो ड्रिप सबसे अच्छा तरीका है। देखें drip irrigation।
- कीट और रोग: फुदका (hopper), मिलीबग, फल मक्खी, पाउडरी मिल्ड्यू और एन्थ्रेक्नोज आम की आम समस्याएं हैं; TNAU पाउडरी मिल्ड्यू के लिए wettable sulphur बताता है। अपने KVK की स्प्रे सारणी और लेबल मानें, और देखें pests। मालफॉर्मेशन दशहरी की, जो एक जनक है, जानी-मानी समस्या है; स्थानीय खतरे के बारे में KVK से पूछें।
कटाई और उपज
- समय: घनी रोपाई में पेड़ दूसरे साल से फलने लगते हैं और अच्छी फसल तीसरे साल से आती है (ICAR)।
- कटाई की अवस्था: हिमाचल ट्रायल में निचली ऊंचाई पर अगस्त के दूसरे हफ्ते के बाद फल का वजन और TSS खास नहीं बढ़े; उस समय तोड़ा फल पकाने के 16 दिन बाद करीब 20 डिग्री Brix पर पहुंचा, जबकि पहले तोड़े फल कम रहे।
- उपज: मल्लिका की प्रति पेड़ या प्रति हेक्टेयर कोई पक्की उपज नहीं मिली। तुलना के लिए, ICAR के अनुसार आम्रपाली ने घनी रोपाई में 3 से 5 साल में प्रति पेड़ 3.5 से 14 किलो (5.6 से 22.4 टन प्रति हेक्टेयर) दी, और दशहरी ने 5 मीटर x 5 मीटर पर पांचवें साल में 6 से 7 टन प्रति हेक्टेयर दी, जबकि 10 मीटर x 10 मीटर पर 2 से 3 टन। TNAU की आम की सामान्य उपज 15 साल की उम्र तक 8 से 10 टन प्रति हेक्टेयर है। इन्हें योजना का दायरा मानें, मल्लिका का वादा नहीं।
लागत, कमाई और बाजार
- बाग की लागत या मल्लिका का भाव पक्का नहीं हो सका, इसलिए नहीं दिया गया। जुलाई और अगस्त में देर के मौसम के भाव mandi bhav पर देखें और स्थानीय व्यापारियों से पूछें कि बड़े बिना रेशे के आम का क्या देते हैं।
- अनुमान कैसे लगाएं: प्रति एकड़ पेड़ x प्रति पेड़ किलो x प्रति किलो भाव, मजदूरी, लागत, सिंचाई और फल आने से पहले के बिना आमदनी वाले सालों का खर्च घटाकर। उदाहरण के लिए 162 पेड़ x 20 किलो x आपका स्थानीय भाव शुरुआती आंकड़ा है; 20 किलो की जगह पड़ोस के आम्रपाली या मल्लिका बाग असल में जितना दें, वह रखें।
- देर से पकना मुख्य फायदा है, क्योंकि कटाई तब आती है जब कई दूसरे आम खत्म हो चुके होते हैं; कटाई बरसात के मौसम में पड़ती है। निर्यात की पूछताछ के लिए export buyers देखें; मल्लिका के निर्यात की कोई पक्की मात्रा नहीं मिली।
- नए बाग के लिए मदद की जानकारी subsidy finder पर जांचें; आम के लिए MIDH की मौजूदा प्रति हेक्टेयर दर पक्की नहीं हो सकी।
स्रोत
- National Horticulture Board, Mango varieties
- Srivastava, Kumar and Rajan, Increasing mango productivity through high density planting, Indian Horticulture (ICAR)
- Rajan and Yadav, Mango hybrids and improved cultivars, Indian Horticulture (ICAR)
- Sharma, Studies on harvest maturity of Mallika and Amrapali mango, Indian Journal of Horticulture 2010
- TNAU Agritech Portal, Mango
