लिलियम भारत में कट फ्लावर के रूप में ठंडे पहाड़ी इलाकों (हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू और कश्मीर, लद्दाख) में चलता है, और छांव तथा ठंडे उपचारित बल्बों के साथ सर्दियों में उत्तरी मैदानों में भी, लेकिन तभी जब बल्ब खरीदने से पहले आपके पास डंडियों का खरीदार हो। बल्ब मुख्य लागत हैं, ज्यादातर आयात होते हैं, और फसल तभी कमाती है जब डंडियां छांटकर और अलग-अलग समय पर बाजार पहुंचें।

भारत में छपी कमाई के हिसाब आशावादी और पुराने हैं। 2013 में लाहौल के किसानों के एक समूह को नुकसान हुआ क्योंकि सबके फूल एक साथ दिल्ली पहुंच गए, इसलिए यहां दिए हर आय के आंकड़े को अपने बल्ब के भाव और नजदीकी थोक भाव से जांची जाने वाली सीमा मानें।

भारत में यह कहां उगता है

  • मुख्य इलाके: हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और जम्मू और कश्मीर जैसे पहाड़ी राज्य, और हरियाणा एक केंद्र के रूप में उभर रहा है। हिमाचल में कुल्लू, सोलन, कांगड़ा, लाहौल और स्पीति में खुले खेत और पॉलीहाउस में व्यावसायिक लिलियम उगाया जाता है; हिमाचल की एक स्टडी में लाभ-लागत अनुपात 2.54:1 बताया गया।
  • लद्दाख: 2026 की एक खबर के अनुसार लेह के चोगलमसर (करीब 3,200 मीटर) के एक खेत से 29 सितंबर 2026 को दिल्ली, मुंबई और चंडीगढ़ के लिए 15,000 A-ग्रेड डंडियों की पहली खेप भेजी गई, और विस्तार की योजना है।
  • मौसम: SKUAST-Kashmir रात में 10 से 12°C और दिन में 22 से 25°C को आदर्श बताता है, गर्मियों में 35 से 50% शेड नेट के साथ; ICAR-IARI 8 से 20°C बताता है। गर्मी से पौधे छोटे रहते हैं और कलियां कम आती हैं।
  • मिट्टी: कम से कम 40 सेमी गहरी, अच्छे जल निकास वाली रेतीली दोमट। pH पर दोनों स्रोत अलग हैं (SKUAST से 6.0 से 7.0; IARI से 5.5 से 6.5), इसलिए अपनी मिट्टी की जांच कराएं और KVK से पूछें। भारी चिकनी मिट्टी और जलभराव से सड़न होती है।

प्रकार और किस्में

प्रकारखासियतभारतीय स्रोतों में बताए उदाहरण
Asiaticसबसे जल्दी, 10 से 13 हफ्ते; सीधे खड़े फूल; आसानी से बढ़ाया जा सकता है और कई कीटों व रोगों के प्रति प्रतिरोधीNavona, Pollyanna, Enchantment, Alaska, Tresor
LA hybridAsiatic जैसा पर मजबूत और छोटाPavia, Eyeliner, Best Seller, Royal Dream
Orientalबड़े, सुगंधित, पीछे मुड़ी पंखुड़ियां; 14 से 18 हफ्ते; बड़े बल्ब चाहिएStargazer, Casa Blanca, Siberia, Sapporo, Viviana
  • शुद्ध सफेद, पीला और गुलाबी रंग लगातार मांग में रहते हैं। किस्म अपनी ऊंचाई और खरीदार की रंग पसंद के हिसाब से चुनें, और बल्ब सिर्फ ऐसे आपूर्तिकर्ता से लें जो आकार, ठंडे उपचार का ब्योरा और किस्म का नाम दे।
  • हिमाचल के YSP University के ट्रायल में 18 genotypes (Asiatic, LA, OT और Oriental) लिए गए, जो ICAR-IARI, Regional Station, Katrain, Kullu से मंगाए गए थे।

बल्ब, रोपाई और दूरी

  • बल्ब का आकार (घेरा): Asiatic और LA के लिए 12 से 18 सेमी, Oriental के लिए 14 से 22 सेमी। बड़े बल्ब से ऊंची डंडी और ज्यादा कलियां मिलती हैं।
  • ठंडा उपचार: रोपाई से पहले बल्बों को कम से कम 10 से 14 हफ्ते ठंड चाहिए। जमे हुए बल्ब मिलें तो उन्हें 7 से 13°C पर 1 से 3 दिन में धीरे-धीरे पिघलाएं।
  • दूरी: ICAR-IARI 15 x 15 सेमी पर प्रति वर्ग मीटर शुद्ध क्यारी में 40 से 50 बल्ब बताता है; SKUAST-Kashmir 15 x 25 सेमी रखता है और प्रति 100 वर्ग मीटर Asiatic के लिए 4,000 और Oriental के लिए 3,000 बल्ब बताता है, पगडंडियां छोड़कर शुद्ध क्यारी के क्षेत्र पर गिने हुए।
  • गहराई और क्यारियां: बल्ब 4 से 12 सेमी गहरे, 4 से 10 सेमी मिट्टी की ढकान के साथ, जल निकास के लिए 20 से 30 सेमी ऊंची क्यारियों पर। हवादार जगह में तार या जाली से सहारा देना चाहिए।
  • मौसम: उत्तर भारत के मैदान: नवंबर और दिसंबर। पहाड़: नवंबर से आगे; पहले से ठंडे किए बल्बों के साथ शेड नेट में रोपाई जुलाई तक बढ़ सकती है।
  • खरपतवारनाशी न डालें; हाथ से निराई करें। सुपरफॉस्फेट से बचें (उसमें फ्लोराइड लिलियम के लिए जहरीला है); लिलियम नमक के प्रति संवेदनशील है, इसलिए ज्यादा उर्वरक न दें।

खाद और सिंचाई

  • SKUAST-Kashmir: रोपाई से पहले प्रति वर्ग मीटर 2 किलो अच्छी सड़ी गोबर की खाद मिलाएं और आधार में प्रति वर्ग मीटर 20:20:15 ग्राम N, P और K। ICAR-IARI: प्रति वर्ग मीटर 5 से 8 किलो गोबर की खाद और अंकुरण के बाद दो बार में प्रति 100 वर्ग मीटर 1 किलो CAN। दोनों में फर्क है, इसलिए मिट्टी की जांच और अपने KVK की सलाह लें।
  • मिट्टी में नमी बनाए रखें, सूखे दौर में एक दिन छोड़कर सिंचाई करें; रोपाई से पहले पानी दें ताकि बल्ब जल्दी जड़ पकड़ें।
  • कम रोशनी और छोटे दिनों में कली गिरती है; इसके लिए रात में बीच-बीच में रोशनी दी जाती है। कलियां दिखने से ठीक पहले 1% कैल्शियम क्लोराइड के छिड़काव से पत्ती झुलसा घटता है।

कीट और रोग

  • कीट: एफिड (जो वायरस भी फैलाते हैं), थ्रिप्स, कटवर्म और माइट। भारतीय स्रोतों में एफिड और थ्रिप्स के लिए प्रति लीटर 2 मिली dimethoate बताया गया है; लेबल के हिसाब से चलें और अपने KVK से पूछें, क्योंकि कट फ्लावर हाथ से संभाले और ताजे बेचे जाते हैं।
  • रोग: जड़ सड़न का समूह (Fusarium, Pythium, Rhizoctonia), बल्ब सड़न, फुट रॉट और जीवाणु मुलायम सड़न। पहला नियंत्रण जल निकास है; रोगी पौधे और बल्ब फेंक दें, रोपाई से पहले बल्ब को फफूंदनाशी से उपचारित करें, और संरक्षित खेती में मिट्टी को जीवाणुरहित करने पर विचार करें।

कटाई और उपज

  • सुबह के समय कटाई करें जब कई कलियों वाली डंडी की पहली कली में रंग दिखे, जमीन से 15 से 20 सेमी ऊपर काटें; बाकी पौधा बल्ब को पोषण देने के लिए रहने दें।
  • प्रति 100 वर्ग मीटर फूलों की डंडियां: Asiatic के लिए 3,500 से 4,000 और Oriental के लिए 2,800 से 3,000 (SKUAST-Kashmir)। IARI के अनुसार हर बल्ब से एक डंडी मिलती है।
  • बल्ब तीन साल तक जमीन में रह सकते हैं, लेकिन हर साल फूल की क्वालिटी गिरती है। लाहौल के मामले में बल्बों ने तीन साल फूल दिए पर क्वालिटी घटती गई।
  • कलियों की संख्या और लंबाई से ग्रेड बनाएं (लाहौल की रिपोर्ट में A ग्रेड कम से कम 70 सेमी और कम से कम तीन फूल बताया गया), छह-छह डंडियों के गुच्छे बनाएं, और 2 से 4°C पर ठंडा करें।
💡 सुझाव: पहले बल्ब आपूर्तिकर्ता और थोक खरीदार से लिखित भाव मांगें। कुछ हफ्तों के अंतर पर खेप में रोपाई करें ताकि आपकी डंडियां एक ही दिन न पहुंचें, और शादी और त्योहार के चरम से पहले बेचें।

लागत और कमाई

  • शुद्ध आय के दावे: ICAR-IARI संरक्षित क्षेत्र के प्रति 1,000 वर्ग मीटर पर Asiatic और LA hybrid के लिए ₹3 से 3.5 लाख और Oriental के लिए ₹4 से 4.5 लाख शुद्ध आय बताता है। SKUAST-Kashmir ने ₹13 प्रति डंडी के (पुराने) भाव पर प्रति 100 वर्ग मीटर प्रति चक्र ₹50,000 तक कुल आय बताई।
  • भाव: लद्दाख की खबर भारत में ₹150 से ₹200 प्रति डंडी बताती है, जो खुदरा या प्रचार का आंकड़ा है; उत्पादकों को मिलने वाले थोक भाव कम होते हैं और दिन व ग्रेड के हिसाब से बदलते हैं। बेचने की योजना वाले हफ्ते में अपनी नजदीकी थोक फूल मंडी देख लें।
  • बल्ब की लागत: सबसे ताजा मिला आंकड़ा 2013 में आयातित बल्ब के 17 यूरो सेंट का था। बल्बों के मौजूदा भाव प्रमाणित नहीं हुए; आपूर्तिकर्ताओं से कोटेशन लें। जांच के लिए: प्रति वर्ग मीटर 40 बल्ब का मतलब 1,000 वर्ग मीटर पर 40,000 बल्ब, यानी बल्ब के भाव में हर ₹1 उस क्षेत्र पर ₹40,000 है।
  • अपने आंकड़ों से दोहराने लायक हिसाब: बिकी डंडियां x प्रति डंडी असल में मिला भाव, घटाइए बल्ब, पॉलीहाउस या शेड नेट, मजदूरी, पैकिंग और ढुलाई, और कोल्ड चेन। जो उत्पादक 2013 के लाहौल के प्रति डंडी 7 यूरो सेंट के भाव पर बेचता है, जबकि बल्ब 17 यूरो सेंट का है, उसे मजदूरी से पहले ही घाटा होता है।

बाजार और जोखिम

  • खरीदार थोक फूल मंडियां, सजावट करने वाले और फूल विक्रेता, और कार्यक्रमों के आपूर्तिकर्ता हैं। कोल्ड चेन और तेज ढुलाई जरूरी है क्योंकि कुछ रिपोर्टों में डंडियां सिर्फ 5 से 7 दिन टिकती हैं।
  • जोखिम: आयातित बल्ब की लागत, एक साथ ज्यादा आवक से भाव गिरना (लाहौल 2013), मैदानों की गर्मी, जड़ सड़न और खराब ग्रेडिंग।
  • polyhouse subsidy, subsidy finder, cold storage subsidy और समूह में बिक्री के लिए FPO देखें। पॉलीहाउस और बल्ब की मौजूदा मदद के लिए अपने राज्य के बागवानी विभाग या KVK से संपर्क करें; यहां कोई मौजूदा दर प्रमाणित नहीं हुई।

स्रोत