कोंजैक (Amorphophallus konjac) भारत में स्थापित फसल नहीं है। कोंजैक कंद के लिए कोई भारतीय किस्म, खेती की सिफारिश या संगठित खरीदार नहीं मिला, और दुनिया की ज्यादातर आपूर्ति चीन, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया से आती है। आज इसे व्यावसायिक फसल की तरह लगाने का मतलब अपने जोखिम पर ट्रायल करना है, और वह भी तभी जब कोई प्रोसेसर या शोध संस्थान कंद लेने के लिए लिखित में राजी हो।
इस वंश की जो फसल भारतीय किसान व्यावसायिक रूप से उगाते हैं वह सूरन (Amorphophallus paeoniifolius) है, जो एक सब्जी है, ग्लूकोमैनन का स्रोत नहीं। सूरन के भाव या उपज को कोंजैक के लिए न मानें। भारत में परखी हुई कंद फसल चाहिए तो elephant foot yam देखें।
फसल के बारे में क्या दर्ज है
- प्रजाति: इस वंश में करीब 200 प्रजातियां हैं, और दुनिया में सिर्फ दो की व्यावसायिक खेती होती है: A. paeoniifolius और A. konjac। Indian Horticulture में एक लेख का शीर्षक "Konjac needs domestication" है, जो बताता है कि यह यहां अभी विकसित फसल नहीं है।
- मूल और उपयोग: यह जापान और चीन से दक्षिण में इंडोनेशिया तक के गर्म उपोष्णकटिबंधीय से उष्णकटिबंधीय पूर्वी एशिया की मूल है। कंद का कार्बोहाइड्रेट मुख्य रूप से (50% से ज्यादा) ग्लूकोमैनन है, जो खाद्य और स्वास्थ्य उत्पादों में काम आता है।
- जलवायु: औसत तापमान 20 से 25 C सबसे अच्छा है, और यह 2,500 मीटर ऊंचाई तक उगती है। विदेशी शोध में 50 से 70% हल्की छांव से कंद का वजन बढ़ना बताया गया है। भारत में ठीक जगहें, अगर हों तो, ठंडे और नम पहाड़ी इलाके होने की संभावना है, लेकिन किसी भारतीय ट्रायल ने इसकी पुष्टि नहीं की।
- मिट्टी और पानी: अच्छे जल निकास वाली, उपजाऊ, नम मिट्टी; मिट्टी की नमी खेत की क्षमता के करीब 75% पर सबसे अच्छी है, और कंद पकते समय करीब 60% तक गिरनी चाहिए। जलभराव कंदों के लिए खतरा है।
रोपाई और बढ़वार का चक्र (विदेशी संदर्भों से)
- प्रवर्धन: कंद या कंद के टुकड़ों से, और tissue culture से। असली A. konjac की रोपण सामग्री की भारत में उपलब्धता की पुष्टि नहीं है; प्रजाति किसी वनस्पति विशेषज्ञ से पक्की करा लें, क्योंकि कई Amorphophallus प्रजातियां एक जैसी दिखती हैं।
- रोपाई: बरसात की शुरुआत में करीब 60 x 60 x 45 सेमी के गड्ढों में, जिनमें मिट्टी, खाद और उर्वरक का मिश्रण भरा हो।
- चक्र: खाने लायक कंद रोपाई के 1 साल बाद और औद्योगिक कंद करीब 3 साल बाद निकाले जा सकते हैं। फूल करीब 4 साल पर आना शुरू होते हैं। एक विदेशी अध्ययन में 3 साल बाद मातृ कंद 600 से 1,000 ग्राम तक पहुंचा, जिसमें 44 से 47% ग्लूकोमैनन था।
- कोंजैक के लिए भारत की प्रति एकड़ उपज, दूरी की सिफारिश या खाद की मात्रा नहीं मिली। बिना स्थानीय ट्रायल के विदेशी आंकड़े भारतीय हालात पर न उतारें।
लागत, कमाई और बाजार
- ताजे या सूखे कोंजैक कंद, चिप्स या ग्लूकोमैनन आटे का कोई पुष्ट भारतीय भाव नहीं मिला, इसलिए यहां प्रति एकड़ मुनाफा नहीं दिया गया है। पौधे बेचने वाला जो भी आंकड़ा बताए, उसे खरीदार के नाम के साथ लिखित में मांगें।
- ग्लूकोमैनन कंद के कतले सुखाकर और पीसकर बनता है; इसके लिए प्रोसेसर चाहिए, और किसान के खेत से कोंजैक लेने वाला कोई भारतीय प्रोसेसर पुष्ट नहीं है। खाद्य सामग्री के रूप में बेचने में FSSAI के नियम भी जुड़ते हैं।
- गारंटीशुदा buy-back वाले सस्ते "कोंजैक बीज" के प्रस्तावों से सावधान रहें। औद्योगिक कंद के लिए करीब 3 साल लेने वाली फसल जमीन को बिना आमदनी और बिना पक्के खरीदार के बांध देती है।
- समूह की व्यवस्था और प्रोसेसिंग के लिए FPO और subsidy finder देखें। कोंजैक के लिए कोई अलग सब्सिडी दर पुष्ट नहीं हुई।
