औद्योगिक टैपिओका (कसावा) भारत में एक परखी हुई फसल है, लेकिन केवल तमिलनाडु के सेलम, नामक्कल और धर्मपुरी के इलाके में, जहां लगभग 1,500 साबूदाना और स्टार्च इकाइयां स्टार्च की मात्रा के हिसाब से कंद खरीदती हैं। इस इलाके के बाहर, जहां पास में कोई फैक्ट्री नहीं, इसे बेचना कठिन है, क्योंकि ताजे कंद भारी होते हैं और जल्दी प्रसंस्करण के लिए होते हैं। इसके लिए नजदीकी फैक्ट्री, शुरू में ही भाव पर सहमति और ज्यादा स्टार्च वाली किस्म चाहिए।
भाव सबसे बड़ा जोखिम है। TNAU की बाजार जानकारी इकाई ने सेलम में कच्चे टैपिओका का भाव खराब सालों में लगभग ₹3,000 प्रति टन से लेकर आपूर्ति घटने पर ₹12,000 प्रति टन तक दर्ज किया है, और भाव कम होने पर इलाके के किसान बार-बार मक्का की ओर गए हैं। इस गाइड के लिए 2026 का कोई भाव जांचा नहीं जा सका; लगाने से पहले फैक्ट्रियों या TNAU DEMIC से ताजा भाव पूछें।
भारत में यह कहां उगता है
- राज्य: तमिलनाडु और केरल मिलकर भारत के लगभग 89% टैपिओका क्षेत्र में हैं। केरल में यह मुख्यतः खाद्य फसल है, तमिलनाडु में मुख्यतः उद्योग के लिए। यह आंध्र प्रदेश और पूर्वोत्तर में भी उगता है।
- तमिलनाडु के जिले (2010-11, TNAU): धर्मपुरी लगभग 29,900 हेक्टेयर, नामक्कल 21,540 हेक्टेयर, सेलम 19,550 हेक्टेयर, विल्लुपुरम 11,520 हेक्टेयर, इरोड 8,690 हेक्टेयर। तमिलनाडु का कुल क्षेत्र लगभग 1.2 लाख हेक्टेयर था। क्षेत्र त्रिची, कुड्डालोर, करूर और तिरुवन्नामलई में बढ़ रहा है।
- जलवायु: तमिलनाडु में यह गर्म, ज्यादातर बारानी फसल है। कसावा सूखा सह लेता है, लेकिन कंद सड़ना एक जानी हुई हानि है, इसलिए जल निकास जरूरी है।
- उत्पादकता: TNAU ने 2011-12 में भारत की औसत कसावा उपज लगभग 34.75 टन प्रति हेक्टेयर बताई, जबकि TNAU केंद्र के एक पहले के पेपर में राष्ट्रीय औसत 22 टन प्रति हेक्टेयर था और कहा गया कि सुझाई पद्धतियों से किसान के खेत की उपज 35 टन तक पहुंच सकती है।
किस्में
| किस्म | स्रोत | खास बातें | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| H-226 (White Rose) | ICAR-CTCRI संकर | स्टार्च लगभग 27%; सेलम में बारानी हालत में अच्छी रही | सेलम के एक सर्वे के सभी 60 किसान उगाते थे |
| H-165 | ICAR-CTCRI संकर | स्टार्च 23 से 25%, 33 से 38 टन प्रति हेक्टेयर, 8 से 9 महीने | लोकप्रिय औद्योगिक किस्म |
| Mulluvadi (MVD-1) | तमिलनाडु में लोकप्रिय (TNAU) | साबूदाना और स्टार्च के लिए खूब अपनाई गई | H-226 और H-165 के साथ सेलम, धर्मपुरी और नामक्कल के 75% से ज्यादा क्षेत्र में |
| Sree Athulya | ICAR-CTCRI, 2014 में जारी | ट्रिप्लॉइड; 35 से 40 टन प्रति हेक्टेयर, 10 महीने, निकालने योग्य स्टार्च लगभग 30% | सेलम, नामक्कल, धर्मपुरी के सिंचित मैदानों के लिए |
| CO 2, CO 3, CO (TP) 4, CO (TP) CTCRI 5 | TNAU | TNAU केंद्र के ट्रायल: अपनी पद्धति से 25.3 से 28.5% स्टार्च, 29.5 से 42.5 टन प्रति हेक्टेयर | नई किस्मों को कलम न मिलने से कम अपनाया गया |
फैक्ट्री से पूछें कि वह कौन सी किस्म पसंद करती है; भुगतान स्टार्च पर निर्भर करता है, और रोगमुक्त स्रोत की कलम उतनी ही जरूरी है जितना किस्म का नाम।
रोपाई और दूरी
- मौसम: TNAU बारानी रोपाई लगभग नवंबर से दिसंबर और मार्च से अप्रैल में, और सिंचित रोपाई लगभग जून से जुलाई में बताता है, ताकि कटाई मानसून से पहले या बाद में पड़े। अपने ब्लॉक की सटीक अवधि TNAU के Tapioca and Castor Research Station, Yethapur से पूछें।
- कलम: स्वस्थ पौधों से 2 या 3 आंख वाली कलम (सर्वे के सभी 60 सेलम किसानों ने यही ली)। सामान्य गाइड 20 से 30 सेमी लंबाई देते हैं। कलम का उपचार और छोटी नर्सरी वायरस वाले पौधे छांटने में मदद करती है।
- दूरी: एक सामान्य गाइड 1 मी x 1 मी या 1 मी x 0.8 मी देता है, यानी लगभग 4,000 से 5,000 पौधे प्रति एकड़ (10,000 से 12,500 प्रति हेक्टेयर)। अपनी किस्म की सिफारिश अपनाएं, क्योंकि शाखाओं वाली किस्मों को ज्यादा जगह चाहिए।
- पोषण: TNAU केंद्र के अध्ययन में गोबर खाद और बेसल NPK, फिर रोपाई के लगभग 90 दिन बाद, जब कंद बनने लगते हैं, नाइट्रोजन और पोटाश की टॉप-ड्रेसिंग बताई गई है; सूक्ष्म पोषक तत्व भी सुझाए गए हैं। प्रति एकड़ किलो मिट्टी जांच और किस्म पर निर्भर है; KVK या Yethapur का कार्यक्रम अपनाएं। देखें उर्वरक।
- केंद्र के नतीजे: TNAU के Yethapur केंद्र ने हरी खाद (ढैंचा) के साथ पोटाश और आधी मात्रा N व P तथा जैव उर्वरक से 42.5 टन प्रति हेक्टेयर, और सुझाई मात्रा के 75% पर फर्टिगेशन से 35.4 टन प्रति हेक्टेयर बताया। काली पॉलिथीन मल्च से खरपतवार पूरी तरह रुके। देखें ड्रिप सिंचाई।
- उड़द, मूंग और फलियों जैसी अंतरफसलें सेलम के किसान लेते हैं।
कीट और रोग
- सेलम अध्ययन की मुख्य समस्याएं: कसावा मोजैक वायरस (सफेद मक्खी और संक्रमित कलम से फैलता है), कंद सड़न, लाल मकड़ी घुन और Phomopsis पत्ती धब्बा। मोजैक और कंद सड़न से गंभीर नुकसान हुआ।
- रोगमुक्त कलम लें, फसल चक्र अपनाएं, खेत में जल निकास रखें और समय पर कटाई करें। सफेद मक्खी के लिए नीम आधारित छिड़काव एक विकल्प है। पैकेज की पुरानी सूचियों के कुछ रसायन अब अनुमत नहीं हैं, इसलिए ताजा सिफारिश अपने KVK से पूछें। देखें कीट।
तुड़ाई और उपज
- अवधि: ऊपर की औद्योगिक संकर किस्मों के लिए 8 से 10 महीने; किस्म और उपयोग के हिसाब से सामान्यतः 8 से 18 महीने।
- उपज: अच्छे प्रबंधन में H-165 और Sree Athulya के लिए 33 से 40 टन प्रति हेक्टेयर (13 से 16 टन प्रति एकड़)। TNAU कहता है कि सुझाई पद्धतियों से खेतों पर ऐसी उपज संभव है, पर सामान्य खेत की उपज कम रहती है।
- समय: कंद जुलाई से अप्रैल तक फैक्ट्रियों में आते हैं, चरम नवंबर से फरवरी में, जब स्टार्च सबसे ज्यादा होता है। जून से अगस्त में निकलने वाले पहाड़ी टैपिओका को साबूदाना और स्टार्च में रंग के कारण ऊंचा भाव मिलता है।
- खुदाई से पहले फैक्ट्री की खरीद की तारीख तय कर लें, क्योंकि कंद प्रसंस्करण के लिए हैं, भंडारण के लिए नहीं।
लागत और कमाई
- लागत: इस गाइड के लिए प्रति एकड़ खेती की लागत का कोई जांचा आंकड़ा नहीं मिला। ताजा लागत तालिका TCRS Yethapur या अपने KVK से पूछें; कलम, खेत की तैयारी, खाद, रोपाई, निराई, मिट्टी चढ़ाई और कटाई की मजदूरी मुख्य मदें हैं।
- भाव का इतिहास (सेलम, TNAU और अखबार): अक्टूबर-नवंबर 2013 के लिए ₹9 से 10 प्रति किलो का अनुमान; 2015 के मध्य में ₹7,200 से 7,800 प्रति टन, अनुमान ₹4,800 से 5,200; दस साल में उत्पादन लगभग आधा होने के बाद सितंबर 2019 में ₹12,000 प्रति टन तक, जबकि पहले यह ₹3,000 तक नीचे था।
- हिसाब (उदाहरण, पुराने भाव): 14 टन प्रति एकड़ (लगभग 35 टन प्रति हेक्टेयर) पर ₹4,800 प्रति टन के हिसाब से कुल आय लगभग ₹67,000; ₹12,000 प्रति टन पर लगभग ₹1.68 लाख। अपनी लागत घटाएं; कम भाव पर मुनाफा गायब हो सकता है।
बाजार और जोखिम
- खरीदार: कच्चे टैपिओका का भाव स्टार्च की मात्रा से तय होता है। TNAU के एक अध्ययन के अनुसार सेलम में लगभग 650 फैक्ट्रियां हैं (TNAU की 2013 की गिनती में सेलम और आसपास लगभग 1,500 साबूदाना और स्टार्च इकाइयां)। साबूदाना व्यापार 2018-19 में ₹504 करोड़ बताया गया, और राशन दुकानों से साबूदाना देने की घोषणा को मांग का और सहारा माना गया।
- आयात: 2015 में व्यापारियों ने वियतनाम और थाईलैंड से खाद्य और औद्योगिक स्टार्च मंगाया, जिससे साबूदाना और स्टार्च के भाव और फिर कंद के भाव गिरे।
- चक्र: कम भाव के बाद क्षेत्र घटता है और आपूर्ति घटने पर भाव चढ़ता है। खराब भाव वाले साल में सब कुछ लगा देना आम गलती है; चक्र का अंदाजा लगाने से बेहतर फैक्ट्री के साथ लिखित व्यवस्था है।
- समूह में बेचना FPO के जरिए मोलभाव में मदद करता है। किसान क्रेडिट कार्ड से फसल का खर्च चल सकता है; अपने जिले में बीमा के लिए मंडी भाव और PMFBY देखें।
स्रोत
- TNAU DEMIC, press note: tapioca will fetch good price, October 2013
- TNAU DEMIC, press note: hill grown tapioca price, 2015
- Journal of Agricultural Extension Management, awareness and adoption of recommended technologies by cassava growers (Salem)
- TNAU Tapioca and Castor Research Station, Yethapur: crop management
- ICAR-CTCRI, Sree Athulya
- DT Next, sago through PDS: farmers upbeat (September 2019)
- BigHaat, cassava farming guide (secondary source)
