अलसी (alsi, tisi; Linum usitatissimum) मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और ओडिशा की स्थापित रबी तिलहन है, और यह अक्टूबर से नवंबर में बोई जाने वाली बारानी या हल्की सिंचाई वाली जमीन के लिए ठीक है। यह कम लागत वाली फसल है, लेकिन भारत में उपज कम है (प्रदर्शन प्लॉट पर सिंचाई के साथ करीब 6 क्विंटल प्रति एकड़ और बारानी में करीब 3), और ज्यादातर तेल उद्योग में जाता है, इसलिए असली बाजार मंडी है, हेल्थ-फूड ब्रांड नहीं।

अलसी का बीज ओमेगा-3 वाले भोजन के रूप में भी बिकता है, लेकिन खाद्य-ग्रेड बीज पर अतिरिक्त भाव खरीदार पर निर्भर करता है, इसलिए उस बाजार के लिए बोने से पहले कोई भी प्रीमियम लिखित में ले लें।

भारत में यह कहां उगती है

  • रकबा: 2020 के एक KVK पेपर में बताए FAO आंकड़ों के अनुसार भारत में करीब 3.2 लाख हेक्टेयर, 1.74 लाख टन और 544 किलो प्रति हेक्टेयर (करीब 220 किलो प्रति एकड़) है। देश में रबी तिलहनों में अलसी का स्थान सरसों के बाद दूसरा है, और फसल हिमालय से कर्नाटक तक फैली है।
  • जलवायु: इसे मध्यम से ठंडा मौसम चाहिए। शुरुआती बढ़वार और दाना भरने के समय सूखा और ज्यादा तापमान उपज और गुणवत्ता घटाते हैं।
  • मिट्टी: प्रदर्शन ट्रायल सागर की मध्यम काली मिट्टी और रीवा की रेतीली चिकनी दोमट (pH 6.5 से 7.1) में हुए। रीवा के कई खेतों में नाइट्रोजन और सल्फर कम थे।

किस्में

किस्मप्रमाणउपयोग
JLS-27KVK रीवा के 225 प्रदर्शन प्लॉट: औसत 14.88 क्विंटल/हेक्टेयरसामान्य बुवाई और सिंचाई के साथ, पूर्वी मध्य प्रदेश
JLS 66, JLS 67KVK सागर का खेत ट्रायल, बारानी: 7.18 और 7.41 क्विंटल/हेक्टेयर, जबकि किसानों के मिलावटी बीज से 3.90 क्विंटल/हेक्टेयरबारानी हालात, विंध्य पठार
Garima, Neelum, Gaurav, Laxmi 27, T 397कानपुर, अलीगढ़ और झांसी में CSAUA&T कानपुर के ट्रायल में इन्हें ज्यादा उपज वाला और स्थिर पाया गया; Gaurav, Laxmi 27 और T 397 में तेल 42 से 45%उत्तर प्रदेश; उपलब्धता और सिफारिश अपने KVK से पूछें
Shekhar, Sweta, Parvati, Shubhra, Padmaniउसी कानपुर ट्रायल में परखी गईं; Parvati की आयोडीन वैल्यू ज्यादा (183) थीऔद्योगिक या तेल के लिए; स्थानीय उपयुक्तता पक्की करें
  • किसान अक्सर पुराना देसी या मिलावटी बीज बोते हैं क्योंकि सुधरा बीज समय पर नहीं मिलता। KVK रिपोर्टें इसे कम उपज की मुख्य वजह बताती हैं; अक्टूबर से पहले प्रमाणित बीज मंगवा लें।
  • सुधरी किस्मों में तेल 40 से 44% होता है; अलग-अलग नमूनों में यह 33 से 47% के बीच रहता है।

बुवाई और दूरी

  • समय: बारानी फसल के लिए अक्टूबर का पहला पखवाड़ा (इससे फसल चूर्णिल आसिता, रतुआ और फली मक्खी से भी बचती है)। जहां सिंचाई है, वहां रीवा के प्रदर्शन में बुवाई 25 अक्टूबर से 10 नवंबर तक हुई और कटाई 15 से 25 मार्च में।
  • बीज दर: सागर के ट्रायल में कतार बुवाई में 25 किलो प्रति हेक्टेयर (10 किलो प्रति एकड़); रीवा में 30 सेमी x 10 सेमी पर 20 किलो प्रति हेक्टेयर (8 किलो प्रति एकड़)। वहां किसान छिटकवां तरीके से 30 से 35 किलो प्रति हेक्टेयर डालते थे, जिससे पौधे असमान आते थे।
  • बीज उपचार: उकठा रोग के खिलाफ Trichoderma 5 ग्राम प्रति किलो और Azotobacter तथा फॉस्फेट घुलाने वाले जीवाणु 5 से 10 ग्राम प्रति किलो, या carbendazim जैसा फफूंदनाशक (लेबल के हिसाब से)।

खाद, पानी और खरपतवार

  • रीवा के प्रदर्शन में इस्तेमाल उर्वरक: प्रति हेक्टेयर 60 किलो N, 40 किलो P2O5, 20 किलो K2O और 25 किलो सल्फर (प्रति एकड़ 24, 16, 8 और 10 किलो), जिसमें पूरा P, K और S बुवाई के समय आधार खुराक में। वहां किसान सिर्फ 12:28:0 डालते थे और सल्फर नहीं। खुराक मिट्टी की जांच के आधार पर तय करें।
  • पानी: रीवा के प्लॉटों में बुवाई से पहले, करीब 35 दिन पर (फूल से पहले) और करीब 70 दिन पर (दाना बनते समय) सिंचाई की गई। सागर के बारानी ट्रायल में KVK की सलाह है कि सर्दी की बारिश न हो तो 30 से 40 दिन पर और फूल से पहले एक-एक सिंचाई करें।
  • खरपतवार: बुवाई के 25 से 45 दिन के बीच फसल सबसे कमजोर रहती है। करीब 30 दिन पर एक बार निराई करें। आम खरपतवारों में Anagallis arvensis, Vicia hirsuta, Fumaria, Melilotus, Chenopodium album और Phalaris minor हैं; परजीवी Cuscuta भारी नुकसान कर सकता है।

कीट और रोग

  • चूर्णिल आसिता, रतुआ, उकठा और फली मक्खी मुख्य समस्याएं हैं। समय पर बुवाई, गर्मी की गहरी जुताई और बीज उपचार इन्हें घटाते हैं।
  • रीवा के प्रदर्शन में 30 दिन पर profenophos और carbendazim के साथ mancozeb के मिश्रण का एक छिड़काव किया गया; मौजूदा सिफारिश के लिए लेबल और अपने KVK की बात मानें। देखें pests।

कटाई और उपज

  • रीवा के प्रदर्शन की फसल, जो 25 अक्टूबर से 10 नवंबर के बीच बोई गई थी, 15 से 25 मार्च के बीच काटी गई।
  • प्रदर्शन की उपज: रीवा में तीन साल में 13.27, 15.71 और 15.65 क्विंटल/हेक्टेयर (औसत 14.88 क्विंटल/हेक्टेयर, करीब 6.0 क्विंटल प्रति एकड़), जबकि किसानों के खेतों में 10.13 क्विंटल/हेक्टेयर (4.1 क्विंटल प्रति एकड़)। सागर में बारानी: 7.2 से 7.4 क्विंटल/हेक्टेयर (करीब 3 क्विंटल प्रति एकड़), जबकि 3.9 क्विंटल/हेक्टेयर।
  • जिले के औसत बहुत कम हैं: रीवा जिले का औसत प्रदर्शनों से पहले 295 किलो/हेक्टेयर था और भारत का करीब 395 से 544 किलो/हेक्टेयर। जब तक अपना प्लॉट कुछ और न दिखाए, कम आंकड़ों पर हिसाब लगाएं।
  • पेराई के बाद बची खली में करीब 36% प्रोटीन होता है और यह पशु आहार में काम आती है; रीवा के प्लॉटों में 26 से 27 क्विंटल/हेक्टेयर भूसा भी निकला।
💡 सुझाव: प्रमाणित बीज को सुझाई दर पर कतारों में बोएं, और योजना में मिट्टी की जांच और सल्फर रखें। रीवा के प्रदर्शनों में उपज 47% बढ़ाने वाले यही बदलाव थे, कोई नई फसल नहीं।

लागत और कमाई

  • लागत (2016 से 2019 के भाव, रीवा): सुधरे पैकेज के लिए ₹18,117 प्रति हेक्टेयर (करीब ₹7,300 प्रति एकड़)। बीज, उर्वरक और मजदूरी आज ज्यादा महंगे हैं; मौजूदा आंकड़ा अपने KVK से पूछें।
  • आज का भाव: Agmarknet रिपोर्टों के एक संकलन में 3 अक्टूबर 2026 को 19 मंडियों में औसत (median) मॉडल भाव ₹9,500 प्रति क्विंटल रहा, जो ₹8,110 (सिटमऊ) से ₹12,609 (गाजियाबाद) के बीच था। भाव रोज बदलते हैं; बेचने से पहले mandi bhav देखें।
  • प्रति एकड़ हिसाब: प्रदर्शन की उपज 6.0 क्विंटल x ₹8,110 से ₹9,500 = कुल आय ₹48,700 से ₹57,000; बारानी उपज 3 क्विंटल x उसी दायरे = कुल आय ₹24,000 से ₹28,500। इसमें से अपनी असली लागत घटाएं। रीवा के ट्रायल में, जिसकी बिक्री 2016 से 2019 के बहुत कम भावों पर हुई, शुद्ध आय ₹37,449 प्रति हेक्टेयर और लाभ-लागत अनुपात 3.06 रहा; सागर के बारानी ट्रायल में शुद्ध आय ₹17,759 से ₹19,129 प्रति हेक्टेयर रही।
  • फसल बीमा के लिए PMFBY देखें, और फसल कर्ज के लिए KCC।

बाजार और बिक्री

  • KVK पेपरों के अनुसार अलसी के तेल का करीब 20% खाने के तेल के रूप में किसान स्तर पर इस्तेमाल होता है और करीब 80% उद्योग (पेंट, वार्निश, छपाई की स्याही, साबुन) में जाता है। इसलिए साधारण मंडी और तेल मिल का रास्ता ही पक्का बाजार है।
  • खाद्य-ग्रेड अलसी के बीज और कोल्ड-प्रेस्ड तेल अलग, छोटा बाजार हैं। वहां साफ, ग्रेड किया, कम नमी वाला बीज मायने रखता है; आपूर्ति का वादा करने से पहले स्थानीय तेल पेराई वालों और हेल्थ-फूड पैकर्स से बात करें।
  • FPO के जरिए समूह में बेचने से सफाई और थोक माल में मदद मिलती है।

स्रोत