चिया (Salvia hispanica) भारत में उगाई जा सकती है, मुख्य रूप से कम लागत वाली फसल के रूप में, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, आंध्र प्रदेश और हरियाणा के सूखे इलाकों की हल्की से मध्यम मिट्टी में, जहां खेती के छोटे-छोटे हिस्से शुरू हुए हैं। यह छोटे दिन का पौधा है, जो तापमान और दिन की लंबाई के प्रति संवेदनशील है, इसलिए बुवाई की तारीख से ही उपज तय होती है। ICAR के ट्रायल में उपज सिर्फ 6 से 8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर मिली है और बीज का भाव गिरता रहा है, इसलिए इसे छोटे प्लॉट पर आजमाने वाली फसल मानें, पूरा खेत दांव पर न लगाएं।
भारत में सबसे मजबूत सबूत ICAR-National Institute of Abiotic Stress Management (NIASM), बारामती से आता है, जिसने सूखा-प्रवण इलाकों की उथली काली मिट्टी के लिए 2021 से 2024 के प्रयोगों से खेती की सिफारिशें तैयार कीं। वाशिम जिले (महाराष्ट्र) ने भी चिया की अपनी मार्गदर्शिका छापी है।
जलवायु, मिट्टी और बुवाई का समय
चिया पथरीली बेसाल्टिक, रेतीली और मध्यम काली मिट्टी में, उथली काली मिट्टी समेत, बारानी या सिंचित हालत में चलती है। इसे अच्छी जल निकासी चाहिए। वाशिम जिले ने मिट्टी का pH 6 से 8, न्यूनतम तापमान करीब 11 डिग्री सेल्सियस, अधिकतम करीब 36 डिग्री सेल्सियस और फसल की अवधि 90 से 120 दिन बताई है।
सरकारी सामग्री में बुवाई की दो अलग-अलग अवधियां दी गई हैं, और इन्हें आपस में नहीं मिलाना चाहिए:
| स्रोत | बुवाई की अवधि | दूरी और बीज दर |
|---|---|---|
| ICAR-NIASM बारामती | 1 अगस्त से 15 सितंबर (ट्रायल में सबसे अच्छी उपज) | जुलाई से सितंबर की बुवाई के लिए 60 x 30 सेमी, अक्टूबर से नवंबर के लिए 50 x 30 सेमी; कतार में बुवाई पर 2 किलो प्रति हेक्टेयर, छिटकवां बुवाई पर 2.5 से 3 किलो |
| वाशिम जिले की मार्गदर्शिका | रबी, 1 अक्टूबर से 15 दिसंबर | 45 x 30 सेमी, गहराई 1.5 सेमी; 1.5 से 2 किलो प्रति हेक्टेयर |
ICAR ट्रायल का नतीजा यह है कि बीज की सबसे ज्यादा उपज (करीब 793 से 811 किलो प्रति हेक्टेयर) 1 अगस्त से 1 सितंबर के बीच की बुवाई से मिली। अक्टूबर से आगे रबी बुवाई हो सकती है, पर उपज कम मिलेगी और सिंचाई करनी होगी। आज 2 अक्टूबर है, इसलिए ज्यादातर किसानों के लिए खरीफ की अवधि निकल चुकी है; अगले सीजन की बुवाई की योजना अभी बनाएं।
बीज और रोपाई
चिया का बीज बहुत छोटा होता है, इसलिए बीज दर सिर्फ 1.5 से 3 किलो प्रति हेक्टेयर है (करीब 0.6 से 1.2 किलो प्रति एकड़)। 60 x 30 सेमी की दूरी पर एक हेक्टेयर में लगभग 55,000 पौधे लगते हैं (करीब 22,000 प्रति एकड़)। बराबर बुवाई के लिए बीज को रेत में मिलाएं और उथला बोएं। सिफारिशों में 15 दिन के पौध की रोपाई का भी जिक्र है। भारत में चिया की कोई व्यापक रूप से अधिसूचित किस्म नहीं है; बीज आमतौर पर निजी सप्लायरों से आता है, इसलिए बीज सिर्फ ऐसे स्रोत से लें जिसका पता लगाया जा सके और शुद्धता का प्रमाणपत्र मांगें। वाशिम की मार्गदर्शिका में शुद्धता 99.5 से 99.9 प्रतिशत और नमी 8 प्रतिशत से कम बताई गई है।
खाद-पोषण और सिंचाई
ICAR-NIASM प्रति हेक्टेयर 90:60:75 किलो N:P2O5:K2O की सिफारिश करता है (करीब 36:24:30 किलो प्रति एकड़), जिसमें नाइट्रोजन इस तरह बांटी जाती है: 50 प्रतिशत बुवाई के समय और 25-25 प्रतिशत बुवाई के 30 और 45 दिन बाद। रबी फसल के लिए करीब 350 मिमी पूरक सिंचाई (संदर्भ वाष्पोत्सर्जन का 60 प्रतिशत) की सिफारिश है, और बुवाई के 30 और 45 दिन बाद 0.5 प्रतिशत पोटैशियम नाइट्रेट के छिड़काव से ट्रायल में करीब 40 प्रतिशत पानी की बचत हुई। वाशिम की मार्गदर्शिका के अनुसार जलवायु, बारिश और फसल की अवस्था के हिसाब से 2 से 6 सिंचाई चाहिए। पानी थोड़ी-थोड़ी मात्रा में देने के लिए drip या sprinkler सिंचाई इस्तेमाल करें; पानी भरने से फसल खराब होती है।
कीट और रोग
ICAR की जिस सिफारिश को पढ़ा गया, उसमें कीट या रोग नियंत्रण का जिक्र नहीं है, और चिया के लिए ऐसी कोई भारतीय कीट सूची नहीं मिली जिसकी पुष्टि की जा सके। हर हफ्ते खेत देखें, और कुछ भी छिड़कने से पहले अपने KVK या कृषि विश्वविद्यालय से संपर्क करें। पहचान में मदद के लिए कीट पेज देखें। फसल नई होने के कारण ऐसे रसायन न डालें जो इसके लिए पंजीकृत नहीं हैं।
कटाई और उपज
जब ज्यादातर बालियां सूख जाएं तब कटाई करें; फसल 90 से 120 दिन लेती है। ICAR-NIASM के ट्रायल आंकड़े: अंतरवर्ती फसल प्रणाली में 628 किलो प्रति हेक्टेयर, और सबसे अच्छी बुवाई तारीखों पर 793 से 811 किलो प्रति हेक्टेयर, यानी करीब 6.3 से 8.1 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (250 से 325 किलो प्रति एकड़)। वाशिम की मार्गदर्शिका 10 से 12.5 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बताती है, जो किसी भी ट्रायल आंकड़े से ज्यादा है, इसलिए कम वाले आंकड़ों पर ही हिसाब लगाएं।
लागत और कमाई
वाशिम की मार्गदर्शिका में खेती की लागत ₹37,500 से 40,000 प्रति हेक्टेयर (करीब ₹15,000 से 16,000 प्रति एकड़) दी गई है। चिया की कोई मंडी भाव श्रृंखला नहीं मिली; भाव के आंकड़े सिर्फ Tridge के व्यापार आंकड़े हैं। भारत का निर्यात भाव 2024 में US$2.06 से 4.44 प्रति किलो था, जो 2023 के US$2.78 से 8.34 से कम है। करीब ₹85 प्रति अमेरिकी डॉलर मानें (यह एक अनुमान है), तो यह करीब ₹175 से 380 प्रति किलो बैठता है।
| प्रति हेक्टेयर | कम वाला अनुमान | ज्यादा वाला अनुमान |
|---|---|---|
| उपज | 628 किलो | 811 किलो |
| भाव (निर्यात पर आधारित, मान्यता) | ₹175 प्रति किलो | ₹380 प्रति किलो |
| कुल आमदनी | करीब ₹1.1 लाख | करीब ₹3.1 लाख |
| लागत (वाशिम) | ₹40,000 | ₹37,500 |
| शुद्ध कमाई | करीब ₹0.7 लाख | करीब ₹2.7 लाख |
प्रति एकड़ के लिए 0.4 से गुणा करें: करीब ₹28,000 से ₹1.1 लाख। किसान को खेत पर असल में मिलने वाला भाव आमतौर पर निर्यात के आंकड़े से नीचे रहेगा, और भाव की यह मान्यता ही सबसे कमजोर कड़ी है। आपकी अपनी मजदूरी, जमीन और ढुलाई का खर्च इसमें नहीं गिना गया है।
बाजार और बिक्री
- चिया का कोई MSP नहीं है, इसलिए मंडी भाव देखें और बुवाई से पहले खरीदारों से लिखित भाव मांगें। MSP वाली फसलों से तुलना के लिए MSP पेज देखें।
- 2023 से 2024 के बीच निर्यात भाव गिरे, जबकि 2024 में भारत का आयात भाव बढ़ा, यानी मांग और आपूर्ति का स्वरूप बदल रहा है। यह मानकर न चलें कि ऊंचा भाव लौट आएगा।
- उन बीज विक्रेताओं से सावधान रहें जो तय दर पर buy-back का वादा करते हैं, और उस "चिया" बीज से भी जो असल में कोई दूसरी Salvia या मिला-जुला लॉट निकले। बीज की पहचान और लिखित समझौते पर जोर दें।
- FPO के जरिए मिलकर बेचने से प्रोसेसर और निर्यातकों तक पहुंचना आसान होता है।
