भारत में कोको दक्षिण में नारियल, सुपारी या ऑयल पाम के नीचे अंतरफसल के रूप में चलती है, जहां मौजूदा छत्र से वह 40 से 50 प्रतिशत छांव मिल जाती है जो इस फसल को चाहिए। यह खेत की फसल नहीं है, और जल्दी वाली भी नहीं: पहली फली पांचवें साल के आसपास आती है, और कमाई ऐसे खरीदार पर टिकी है जो आपकी बीन्स ऐसे भाव पर ले जिसे आप जांच सकें।
भारत में कोको का उत्पादन छोटा है, एक संकलन के अनुसार 2024-25 में करीब 33 हजार टन, जिसमें आंध्र प्रदेश सबसे बड़ा उत्पादक (करीब 40 प्रतिशत) और केरल उसके बाद (करीब 36 प्रतिशत) है, फिर कर्नाटक और तमिलनाडु। 2024 में दुनिया के भाव तेजी से चढ़े, लेकिन घरेलू फसल बढ़ने पर कुछ खरीदारों का रुख ठंडा रहा, इसलिए पौधे लगाने से पहले लिखित buy-back पक्का करें।
भारत में यह कहां उगती है
- राज्य: आंध्र प्रदेश (एक डेटासेट के अनुसार 2024 में करीब 43,900 हेक्टेयर और 12,400 टन), केरल, कर्नाटक और तमिलनाडु। इस फसल को वायनाड में 1964 में बढ़ावा दिया गया था, और व्यापार रिपोर्टों के अनुसार 1 लाख से ज्यादा किसान इसे अपना चुके हैं।
- जलवायु (TNAU): समुद्र तल से 1,200 मीटर तक की ऊंचाई, 1,000 से 2,000 मिमी बारिश, करीब 80 प्रतिशत नमी, तापमान 15°C से 35°C के बीच।
- मिट्टी: लाल लैटेराइट मिट्टी बेहतर; pH 6.5 से 7.0 सबसे अच्छा है, और फसल 4.5 से 8.0 तक सह लेती है।
- छांव: पौध अवस्था में करीब 50 प्रतिशत और बाद में 40 प्रतिशत छांव। नारियल और सुपारी के बाग में यह पहले से मिलती है।
प्रकार और किस्में
- TNAU कोको के तीन प्रकार Criollo, Forastero और Trinitario बताता है, और कहता है कि भारत में Forastero सबसे अच्छा चलता है।
- CPCRI कासरगोड ने VTLCC-1, VTLCS-1, VTLCS-2 और VTLCH-1 से VTLCH-4 कोड वाले उन्नत चयन और संकर जारी किए हैं। इनकी मौजूदा खासियत और पौधों की उपलब्धता CPCRI या अपने राज्य के बागवानी विभाग से पूछें, क्योंकि हर किस्म की उपज का कोई पुष्ट आंकड़ा नहीं मिला।
- पौधे सिर्फ CPCRI, राज्य कृषि विश्वविद्यालय, राज्य की नर्सरी या खरीदार से जुड़ी कंपनी की नर्सरी से लें। 2016 की एक रिपोर्ट के अनुसार Mondelez की 11 नर्सरियां करीब 5,000 किसानों को पौधे देती थीं।
दूरी और रोपाई
- नारियल के नीचे: प्रति हेक्टेयर करीब 500 पौधे (प्रति एकड़ करीब 200)।
- सुपारी के नीचे: 2.7 x 2.7 मीटर, प्रति हेक्टेयर करीब 686 पौधे (प्रति एकड़ करीब 278)।
- ऑयल पाम के नीचे: 4.5 x 4.5 मीटर, प्रति हेक्टेयर करीब 400 पौधे (प्रति एकड़ करीब 162)।
- अकेली फसल के रूप में TNAU 7.5 x 7.5 मीटर बताता है। अंतरफसल की दूरी आपके मौजूदा बाग की कतारों के हिसाब से बैठनी चाहिए, इसलिए गड्ढे चिह्नित करने से पहले CPCRI या अपने KVK से पक्का कर लें।
खाद और सिंचाई
TNAU प्रति पौधा प्रति साल ये मात्राएं बताता है, दो हिस्सों में बांटकर:
| पौधे की उम्र | यूरिया (ग्राम) | रॉक फॉस्फेट (ग्राम) | म्यूरेट ऑफ पोटाश (ग्राम) | पानी (लीटर प्रति पौधा प्रति दिन) |
|---|---|---|---|---|
| पहला साल | 72 | 65 | 77 | 3 से 5 |
| दूसरा साल | 144 | 130 | 154 | 10 |
| तीसरे साल से आगे | 220 | 200 | 230 | 20 से 25 |
- तीसरे साल से आगे और प्रति हेक्टेयर 500 पौधों पर यह प्रति हेक्टेयर साल में करीब 110 किलो यूरिया, 100 किलो रॉक फॉस्फेट और 115 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश बैठता है (प्रति एकड़ करीब 44, 40 और 46 किलो)। जैविक खाद डालें और मिट्टी की जांच के हिसाब से बदलें; fertilizers देखें।
- TNAU के पानी के आंकड़े ऊपर तालिका की तरह प्रति पौधा प्रति दिन हैं; सूखे महीनों में इन्हें कैसे बांटें, यह CPCRI या अपने KVK से पूछें। drip irrigation देखें।
कीट और रोग
- TNAU मुख्य कीट के रूप में मीलीबग, चाय का मच्छर कीट (tea mosquito bug), flatid plant hopper, माहू, रोएंदार इल्लियां, तना छेदक, चूहे और गिलहरियां बताता है।
- मुख्य रोग: पौध झुलसा, black pod rot, तना कैंकर, vascular streak dieback और cherelle wilt।
- किसी भी छिड़काव के लिए लेबल और CPCRI, KAU या अपने KVK की सलाह के हिसाब से चलें; pests देखें।
कटाई और उपज
- फली पांचवें साल से आती है (TNAU)। फली को पकने में 140 से 160 दिन लगते हैं, और कटाई हर 10 से 15 दिन पर होती है।
- TNAU प्रति पेड़ साल में 50 से 70 फली बताता है, और 10 से 12 फली से 1 किलो गीली बीन्स मिलती हैं, यानी प्रति पेड़ करीब 4 से 7 किलो गीली बीन्स।
- गीली बीन्स को किण्वित करके धूप में सुखाकर बेचा जाता है, और सूखा वजन गीले वजन से काफी कम होता है। प्रति पेड़ सूखी बीन्स का कोई पुष्ट भारतीय आंकड़ा नहीं मिला, इसलिए अपने खरीदार से गीले से सूखे का अनुपात और किण्वन का वह स्तर पूछें जिस पर वे भुगतान करते हैं।
लागत और कमाई
- भाव के सबूत कमजोर हैं। अगस्त 2026 में Agmarknet पर केरल के थोडुपुझा में ₹11,800 से ₹12,000 प्रति क्विंटल (करीब ₹118 से ₹120 प्रति किलो) दिखा, जो सिर्फ एक मंडी से था और बीन्स का ग्रेड नहीं लिखा था, इसलिए इसे सूखी बीन्स का भाव न मानें। अंतरराष्ट्रीय भाव 2024 के आखिर में करीब US$13,000 प्रति टन तक गए और सितंबर 2025 तक करीब US$7,000 पर आ गए।
- हिसाब का ढांचा: प्रति एकड़ पेड़ x प्रति पेड़ किलो x प्रति किलो भाव। उदाहरण के लिए नारियल के नीचे 200 पेड़ प्रति पेड़ 4 किलो गीली बीन्स पर 800 किलो गीली बीन्स देते हैं; इसे उस रूप में बदलें जिसके लिए खरीदार भुगतान करता है, उनके पक्के भाव से गुणा करें और कटाई, फली तोड़ने, किण्वन और सुखाने की मजदूरी घटाएं।
- प्रति एकड़ उपज, भाव और लागत किसी पुष्ट भारतीय स्रोत से नहीं मिले, इसलिए यहां मुनाफे का कोई आंकड़ा नहीं दिया गया है। नारियल या सुपारी के बाग में जमीन और सिंचाई का खर्च पहले से चल रहा होता है, इसलिए कोको की अतिरिक्त कमाई को मुख्यतः पौधों, खाद, कटाई की मजदूरी और प्रोसेसिंग का खर्च पूरा करना होता है।
बाजार और जोखिम
- चॉकलेट बनाने वाली कंपनियां घरेलू बीन्स खरीदती हैं, लेकिन 2016 में Mondelez के बारे में बताया गया कि वह भारत की अपनी जरूरत का सिर्फ एक तिहाई यहीं से लेती है। सुपारी और कोको की सहकारी संस्था Campco ने पुत्तूर, कर्नाटक की अपनी चॉकलेट यूनिट के लिए कोको खरीदा है, और आंध्र प्रदेश के पश्चिम गोदावरी में खरीद केंद्र बनाया (2014 की रिपोर्ट)।
- हाल की रिपोर्टें बताती हैं कि ऊंची घरेलू फसल पर बड़े खरीदारों का रुख ठंडा रहा, जिससे किसान भाव गिरने के जोखिम में रहते हैं। खरीदार से मौजूदा शर्तें लें।
- कोको के लिए MIDH या राज्य की सब्सिडी दर की पुष्टि नहीं हुई; subsidy finder और अपना बागवानी विभाग देखें, और समूह में बिक्री के लिए FPO देखें।
