मीठी चेरी (Prunus avium) ऊंचे पहाड़ों का फल है: भारत में इसकी व्यावसायिक खेती लगभग सिर्फ कश्मीर में होती है, हिमाचल प्रदेश में कम क्षेत्र में और उत्तराखंड में थोड़ी, करीब 1,600 से 2,700 मीटर की ऊंचाई पर जहां सर्दी इतनी ठंडी हो कि पेड़ की सुषुप्तावस्था टूट सके। इसके लिए कलमी पौधा चाहिए, पहली फसल में 4 से 5 साल लगते हैं, और पकने के समय बारिश से बचाव चाहिए, इसलिए यह लंबे समय का बाग लगाने का फैसला है, जल्दी नकद देने वाली फसल नहीं।
कश्मीर भारत की 90 प्रतिशत से ज्यादा चेरी करीब 2,800 हेक्टेयर में पैदा करता है, और सामान्य उत्पादन 12,000 से 13,000 टन है। इन्हीं बागों से फसल का जोखिम भी दिखता है: 2023 की बरसात ने कश्मीर की फसल को बुरी तरह घटा दिया, और 2026 में बेमौसम मौसम से उत्पादन 35 से 40 प्रतिशत गिरा जबकि भाव चढ़े।
भारत में यह कहां उगती है
- जम्मू और कश्मीर: 2016-17 में 2,835 हेक्टेयर और 8,282 टन (ICAR-CITH का शोध पत्र)। मुख्य इलाके श्रीनगर, गांदरबल और शोपियां हैं, और बारामूला, बडगाम और अनंतनाग में भी अच्छा क्षेत्र है। अकेले गांदरबल में 2024-25 में 1,165 हेक्टेयर और करीब 9,095 टन बताया गया, और शोपियां में 613 हेक्टेयर और 4,927 टन।
- हिमाचल प्रदेश: कम क्षेत्र, ज्यादातर शिमला, कुल्लू, मंडी, चंबा और लाहौल-स्पीति में, ऊंचे इलाकों में।
- जलवायु: चेरी करीब 1,600 से 2,700 मीटर पर उगाई जाती है और इसे सर्दी की ठंड चाहिए। जहां ठंड कम पड़ती है वहां कम ठंड वाली किस्में चाहिए; अपने राज्य के बागवानी विश्वविद्यालय से पूछें कि आपकी ऊंचाई पर कौन सी परखी गई हैं।
- उपज का फर्क: CITH के शोध पत्र में भारत का औसत 2.92 टन प्रति हेक्टेयर (करीब 1.2 टन प्रति एकड़) बताया गया है, जो दुनिया के औसत से बहुत कम है, मुख्यतः बीजू मूलवृंत वाले पुराने बागों के कारण।
- मौसम: फल मई से जून में तोड़ा जाता है, जब बाजार में ताजा फल कम होते हैं, इसीलिए यह ऊंचे भाव पर बिकता है।
किस्में
| किस्म (स्थानीय नाम) | स्रोत | आंकड़े क्या बताते हैं |
|---|---|---|
| Bigarreau Napoleon (Double) | ICAR-CITH श्रीनगर का ट्रायल, 3 x 3 मीटर रोपाई | सबसे ज्यादा उपज, 10.83 टन/हेक्टेयर (करीब 4.4 टन/एकड़); सबसे बड़ा फल, करीब 10 ग्राम; पारंपरिक किस्म होने से बारिश में फटने का खतरा |
| Bigarreau Noir Grossa (Mishri) | उसी ट्रायल में | 7.18 टन/हेक्टेयर; सबसे ज्यादा मिठास (17.3 डिग्री Brix) |
| Steela (Stella) | उसी ट्रायल में | 7.05 टन/हेक्टेयर; सालाना टहनी की बढ़त सबसे मजबूत। UC Davis के अनुसार Stella स्व-संगत है |
| Van | उसी ट्रायल में | 5.39 टन/हेक्टेयर |
| Lambert | उसी ट्रायल में | सबसे कम उपज, 4.42 टन/हेक्टेयर |
| Lapins | UC Davis Foundation Plant Services | स्व-संगत, 500 chill hours; कश्मीर के चयन कार्य में भी शामिल |
- Makhmali और Awal Number स्थानीय पारंपरिक प्रकार हैं; कश्मीर की प्रेस में Siya और Makhmali को जल्दी वाले और Double व Mishri को मुख्य पारंपरिक प्रकार बताया गया है।
- नई किस्में, ज्यादातर इटली की, करीब दो महीने की लंबी अवधि में पकती हैं और मध्यम बारिश बेहतर झेलती हैं, जबकि पारंपरिक प्रकार जून के बीच से जुलाई की शुरुआत में एक साथ पकते हैं और आसानी से फट जाते हैं।
- भारत के ज्यादातर पुराने बाग खट्टी चेरी के बीजू मूलवृंत पर हैं, इसलिए पेड़ एक जैसे नहीं होते। CITH के शोध पत्र के अनुसार नए बाग क्लोनल मूलवृंत और सघन रोपण की ओर बढ़ रहे हैं। अपनी नर्सरी से किस्म और मूलवृंत का नाम लिखित में लें।
रोपण सामग्री और दूरी
- अच्छी शाखाओं वाले कलमी पौधे शुरुआती वसंत में लगाएं। CITH के ट्रायल में 3 x 3 मीटर (1,111 पेड़ प्रति हेक्टेयर, करीब 450 प्रति एकड़) की दूरी, modified central leader ढांचा और फरवरी से मार्च में सुषुप्ता अवस्था की कटाई रखी गई।
- एक खेती गाइड (दूसरे दर्जे का स्रोत) बीजू मूलवृंत के पेड़ों के लिए 6 x 6 मीटर बताती है, यानी करीब 278 पेड़ प्रति हेक्टेयर (करीब 112 प्रति एकड़)।
- 1 मीटर x 1 मीटर x 1 मीटर के गड्ढे रोपाई से करीब 4 हफ्ते पहले 45 किलो गोबर की खाद और 0.5 किलो सिंगल सुपरफॉस्फेट से भरें; रोपाई पर पौधे को 70 से 80 सेमी पर काट दें (वही गाइड)।
- परागण: Lapins और Stella स्व-संगत हैं, लेकिन बहुत सी मीठी चेरी को उसी समय फूलने वाली दूसरी किस्म चाहिए। एक ही किस्म का ब्लॉक लगाने से पहले अपनी नर्सरी से परागण वाली किस्म पक्की कर लें।
खाद और सिंचाई
- खेती गाइड की प्रति पेड़ मात्राएं: पहले साल 10 किलो गोबर की खाद, 200 ग्राम calcium ammonium nitrate, 160 ग्राम सिंगल सुपरफॉस्फेट और 100 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटाश; 10 साल और उसके बाद 60 किलो खाद, 2 किलो calcium ammonium nitrate, 1.6 किलो सुपरफॉस्फेट और 1 किलो म्यूरेट ऑफ पोटाश। यह दूसरे दर्जे का स्रोत है, इसलिए मिट्टी की जांच और अपने राज्य के बागवानी विभाग से पक्का कर लें।
- चेरी के लिए भारत का कोई पुष्ट सिंचाई कार्यक्रम नहीं मिला; अपनी घाटी के लिए राज्य के बागवानी विभाग या KVK से पूछें। जहां पानी कम हो वहां drip irrigation देखें।
कटाई और उपज
- क्लोनल मूलवृंत पर सघन बागों में फल रोपाई के 4 से 5 साल बाद आने लगते हैं, और CITH के शोध पत्र में दिए यूरोपीय ट्रायल के अनुसार 7 से 8 साल बाद प्रति पेड़ करीब 10 किलो की पूरी पैदावार मिलती है।
- CITH श्रीनगर के ट्रायल में 6 से 9 साल की उम्र पर उपज किस्म के हिसाब से 4.4 से 10.8 टन प्रति हेक्टेयर रही, यानी करीब 1.8 से 4.4 टन प्रति एकड़।
- सिर्फ आकार नहीं, रंग और स्वाद देखकर तुड़ाई करें। भारत की सिर्फ करीब 10 प्रतिशत चेरी प्रोसेस होती है; बाकी ताजी बिकती है।
लागत और कमाई
- भाव (कश्मीर, व्यापार और प्रेस रिपोर्ट): जुलाई 2023 में पारंपरिक किस्में ₹30 से ₹50 प्रति किलो और नई किस्में ₹100 से ₹130 प्रति किलो बिकीं। 2026 के मौसम में प्रीमियम किस्में US$2.62 से US$4.19 प्रति किलो और Double व Mishri US$1.78 से US$2.10 प्रति किलो बताई गईं।
- प्रति एकड़ कुल आय का उदाहरण (शुद्ध नहीं): ₹40 प्रति किलो पर 1.8 टन (पारंपरिक) करीब ₹72,000; ₹100 से ₹130 प्रति किलो पर 4.4 टन (नई किस्में) करीब ₹4.4 से ₹5.7 लाख। पैकिंग, मजदूरी, कमीशन और ढुलाई इसी में से जाएंगे।
- भारत में चेरी के बाग लगाने की कोई पुष्ट लागत नहीं मिली, इसलिए पौधों, सहारे, बाड़, सिंचाई और कवर के कोटेशन अपने बागवानी विभाग से लें।
- बाग को पहले 4 से 5 साल कोई कमाई नहीं होती। कर्ज में इस अंतराल को शामिल करें; KCC और subsidy finder देखें। शीतोष्ण फलों के लिए MIDH और राज्य की दरें जांचकर ही उन पर भरोसा करें।
बाजार और जोखिम
- कश्मीर में चेरी का व्यापार शोपियां और दूसरी घाटी की मंडियों से चलता है। 2026 में Siya और Makhmali जैसी जल्दी वाली किस्में पिछले मौसम से करीब US$1 प्रति किलो ऊपर बताई गईं, और देर से पकने वाली प्रीमियम किस्मों के सबसे ऊंचे भाव मिले।
- बारिश, ओले और फूल के समय की ठंड से पूरा मौसम बर्बाद हो सकता है: 2023 की एक रिपोर्ट में कश्मीर का सालाना कारोबार ₹130 से ₹150 करोड़ बताया गया और उस साल करीब 75 प्रतिशत नुकसान। देखें कि आपके जिले में चेरी PMFBY में अधिसूचित है या नहीं।
- ऊंचे पहाड़ों के बाहर यह फसल नहीं जमती, इसलिए भाव की खबरों के भरोसे गर्म मैदानों के लिए पौधे न खरीदें।
स्रोत
- Srivastava, Kumar and Barman, Sweet cherry cultivars under high density planting, Journal of Horticultural Sciences 14(1), 2019 (ICAR-CITH Srinagar)
- Indian Journal of Horticulture 71(2), 2014, sweet cherry diversity in Kashmir (ICAR-CITH)
- UC Davis Foundation Plant Services, Lapins cherry
- FreshPlaza, lower Kashmir cherry production offset by higher prices (2026 season)
- Kashmir Despatch, new varieties fetch good rates, traditional ones sold at peanuts (July 2023)
- Down To Earth, wettest May-June in a decade hits Kashmir's cherry growers (2023)
- Agrifarming, cherry fruit cultivation (secondary source)
