सिंघाड़ा (water chestnut, Trapa) बरसात की फसल है जो 0.3 से 0.6 मीटर पानी की गहराई वाले तालाबों और उथली आर्द्रभूमि में होती है, मुख्य रूप से बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में, जुलाई के आसपास लगाई जाती है और अक्टूबर से दिसंबर में तोड़ी जाती है। यह उन लोगों के लिए है जिनके पास तालाब है या जो पट्टे पर ले सकते हैं; यह सूखी जमीन की फसल नहीं है, और असली अड़चनें जलाशय का अधिकार, तुड़ाई की मजदूरी और बिक्री की छोटी खिड़की हैं।
भारत के उपज रिकॉर्ड में ताजा फल औसतन करीब 4 से 4.5 टन प्रति हेक्टेयर (1.6 से 1.8 टन प्रति एकड़) है, और बताई गई संभावित उपज 1 से 6 टन प्रति हेक्टेयर तक फैली है। खेती की लागत या खेत-द्वार भाव का कोई भरोसेमंद छपा आंकड़ा नहीं मिला, इसलिए नीचे कमाई को एक सूत्र के रूप में दिखाया है जिसे आप अपने स्थानीय भाव पर लगाएं।
भारत में यह कहां उगता है
- राज्य: बिहार, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब और तमिलनाडु (B.R. Jana की ICAR-RCER समीक्षा)। समीक्षा में क्षेत्रफल करीब 16,900 हेक्टेयर और उत्पादन 67,600 टन बताया गया है।
- पानी: ठहरा हुआ या धीमा मीठा पानी, जिसका pH करीब 6.7 से 8.2 बताया गया है। ICAR-RCER के अनुसार पूरी बढ़वार में 0.30 से 0.60 मीटर पानी चाहिए, जबकि पारंपरिक तालाब 3 से 5 फुट (करीब 0.9 से 1.5 मीटर) गहरे होते हैं, जिससे उपज घटती है।
- मौसम: यह जुलाई से नवंबर तक उगाया जाता है। ICAR-RCER के दरभंगा तालाब ट्रायल में सिंघाड़ा अगस्त के दूसरे सप्ताह में लगाया गया और पहली तुड़ाई अक्टूबर के आखिरी सप्ताह में हुई।
- प्रजातियां: भारत से Trapa natans और Trapa bispinosa दोनों की जानकारी है।
किस्में
| प्रकार | स्रोत | खासियत | टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| Green Spineless | ICAR-RCER की समीक्षा में बताया गया जीनोटाइप | प्रति हेक्टेयर 12 टन तक बताई गई, जबकि Bihar Large Red की 7 टन | औपचारिक रूप से जारी किस्म नहीं है; रोपण सामग्री के लिए शोध केंद्र से पूछें |
| Bihar Large Red | नामित स्थानीय लाइन | समीक्षा में 7 टन प्रति हेक्टेयर | समीक्षा में तुलना की लाइन के रूप में इस्तेमाल हुई |
- ICAR-IIVR के 2024 के 23 accessions के अध्ययन में पाया गया कि ताजे फल की उपज पत्तियों की संख्या और फल के वजन के साथ बढ़ती है, और इन गुणों पर प्रजनन संभव है। भारत में कई स्थानीय accessions हैं पर नामित, जारी की गई किस्में कम हैं।
- स्वस्थ स्थानीय फसल के बड़े, अच्छी तरह भरे फल या बेलें लें, और अपने KVK या नजदीकी ICAR केंद्र से पूछें कि सुधरी लाइनें कहां मिलती हैं।
रोपाई और दूरी
- ICAR-RCER के एकीकृत ट्रायल में सिंघाड़ा करीब 7,000 पौधे प्रति हेक्टेयर (करीब 2,800 प्रति एकड़) लगाया गया।
- पूरे मौसम में पानी 0.3 से 0.6 मीटर के भीतर रखें; ऊपर की तारीखों से आगे भारत की कोई विस्तृत रोपाई अनुसूची नहीं मिली, इसलिए अपने KVK की सलाह मानें।
- पहले तय करें कि तालाब पर अधिकार किसका है। अगर तालाब आपका अपना नहीं है, तो निवेश से पहले मालिक (अक्सर पंचायत या कोई सरकारी विभाग) से पट्टा या अनुमति लिखित में लें।
पोषण और कीट
- सिंघाड़े के लिए भारत की कोई खाद अनुसूची नहीं मिली। अपने KVK से पूछें, और जिस पानी में मछली भी हो वहां रसायनों का भारी इस्तेमाल न करें।
- भारतीय अध्ययनों में सिंघाड़ा भृंग (Galerucella birmanica) को मुख्य कीट बताया गया है, और इसके विरुद्ध पौध की जड़ डुबोने के उपचार इस्तेमाल होते हैं। मौजूदा सिफारिश के लिए अपने KVK से पूछें और लेबल के हिसाब से चलें, क्योंकि फसल पानी में उगती है और खाई जाती है।
तुड़ाई और उपज
- पारंपरिक तालाबों में तुड़ाई देर अक्टूबर (ICAR-RCER के दरभंगा ट्रायल में पहली तुड़ाई) से दिसंबर तक चलती है। तुड़ाई के अंतराल और खरीदार को किस अवस्था का फल चाहिए, यह स्थानीय उत्पादकों से पूछें।
- औसत: प्रति हेक्टेयर 4 से 4.5 टन ताजा फल और 1 से 1.5 टन सूखा फल (Jana समीक्षा), यानी प्रति एकड़ करीब 1.6 से 1.8 टन ताजा और 0.4 से 0.6 टन सूखा।
- दायरा: ICAR-RCER प्रति हेक्टेयर 1 से 6 टन की उपज क्षमता बताता है (प्रति एकड़ 400 से 2,400 किलो)। गहरे पारंपरिक तालाबों में उपज आमतौर पर कम रहती है।
लागत और कमाई
- भाव: कोई सत्यापित खेत-द्वार भाव नहीं मिला। ताजे सिंघाड़े का भाव मौसम और शहर के हिसाब से बदलता है; सीजन के पहले हफ्तों में स्थानीय व्यापारियों से और मंडी भाव में देखें।
- सूत्र (प्रति एकड़): 1.6 से 1.8 टन ताजे फल पर हर ₹10 प्रति किलो के भाव से ₹16,000 से ₹18,000 मिलते हैं; हर ₹20 प्रति किलो पर ₹32,000 से ₹36,000। प्रति एकड़ 400 किलो की कम उपज पर वही ₹10 सिर्फ ₹4,000 देता है।
- लागत: रोपण सामग्री, रोपाई और बार-बार तुड़ाई की मजदूरी, नाव का किराया, तालाब का पट्टा और ढुलाई। भारत में खेती की लागत का कोई छपा आंकड़ा नहीं मिला; एक सीजन का अपना हिसाब खुद दर्ज करें।
- ICAR-RCER के दरभंगा ट्रायल में तालाबों में मखाना, मछली और सिंघाड़ा साथ लिए गए; ये संयोजन अकेले मखाने से ज्यादा कमा गए, लेकिन ये नतीजे एकीकृत प्रणाली के हैं, अकेले सिंघाड़े के नहीं।
बाजार और जोखिम
- ज्यादातर सिंघाड़ा अक्टूबर से दिसंबर में स्थानीय बाजारों में ताजा, उबला या कच्चा बिकता है, और इसे सुखाकर पीसा भी जाता है जिसका सिंघाड़े का आटा व्रत के खानों में इस्तेमाल होता है।
- जब कई तालाबों की तुड़ाई एक साथ होती है तो भाव गिर सकते हैं। पास की शहरी मंडी या प्रोसेसर को बेचना, या सूखा फल और आटा बनाना, जोखिम बांटता है। समूह में बिक्री के लिए FPO देखें।
- रोपाई और तुड़ाई में पानी में लंबे घंटे लगते हैं और मेहनत ज्यादा है; मजदूरी की योजना पहले से बनाएं।
- मत्स्य, तालाब और बागवानी की मदद के लिए subsidy finder और अपने राज्य का मत्स्य विभाग देखें। सिंघाड़े की कोई अलग सब्सिडी दर सत्यापित नहीं हुई।
स्रोत
- Jana B.R., Recent production and marketing scenarios of water chestnut (Trapa spp.) in India: a review, Agricultural Reviews (ICAR-RCER, Darbhanga)
- Singh I.S. et al., Integrated aquaculture with fox nut, a case study from North Bihar, Int. J. Curr. Microbiol. App. Sci. (2017)
- Dubey R. et al., Genetic variability in water chestnut for nut yield and mineral composition, Indian Journal of Horticulture (ICAR-IIVR, 2024)
