स्ट्रॉबेरी भारत में ठंडे मौसम की, साल में एक बार फल देने वाली फसल के रूप में चलती है: पौधे सितंबर से नवंबर के आसपास लगते हैं, फल लगभग नवंबर से अप्रैल तक आता है, और सबसे जाना-माना इलाका महाराष्ट्र का महाबलेश्वर-पंचगनी है, साथ ही असम और छत्तीसगढ़ के मैदानों में भी ट्रायल और उत्पादक हैं, और दूसरे राज्य इसी ठंडे मौसम के तरीके से खेती करते हैं। इसमें हर साल रोगमुक्त पौध, प्लास्टिक मल्च वाली ऊंची क्यारियां, ड्रिप सिंचाई और तुड़ाई के एक-दो दिन के भीतर पहुंचने वाला बाजार चाहिए, क्योंकि फल टिकता नहीं।
पहले ही सीजन में आमदनी आ सकती है, लेकिन लागत ऊंची है और जब स्थानीय आवक चरम पर होती है तो भाव तेजी से गिरता है, इसलिए लगाने से पहले अपना ब्रेक-ईवन भाव निकाल लें।
यह कहां उगती है और क्या चाहिए
- जलवायु: NHB की मॉडल परियोजना स्ट्रॉबेरी को शीतोष्ण फसल बताती है; कुछ किस्में उपोष्णकटिबंधीय इलाकों में चलती हैं। कलियां 12 घंटे या उससे कम दिन की रोशनी और मध्यम तापमान में बनती हैं, इसलिए रोपाई का समय ठंडे मौसम से बंधा है, दूसरी फसलों के कैलेंडर से नहीं।
- मिट्टी: रेतीली दोमट से दोमट, pH 5.7 से 6.5 (NHB)। ज्यादातर जड़ें ऊपर के 15 सेमी में रहती हैं, इसलिए गहराई से ज्यादा जल निकास और जैविक पदार्थ मायने रखते हैं। भारी, गीली मिट्टी में red stele (जड़ का एक रोग) फैलता है।
- महाबलेश्वर: महाबलेश्वर स्ट्रॉबेरी को GI टैग (2010) मिला है और दूसरे दर्जे की रिपोर्टें इस पट्टी का उत्पादन साल में करीब 30,000 से 35,000 टन बताती हैं। वहां के उत्पादक कथित तौर पर हर जून मदर प्लांट मंगाते हैं, वाई की नर्सरियों में रनर तैयार करते हैं, सितंबर में खेत में लगाते हैं और नवंबर से लगभग अप्रैल के मध्य तक तुड़ाई करते हैं।
- मैदान: छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव (ऊंचाई 307 मीटर) में IGKV के ट्रायल में 20 अक्टूबर 2016 को रोपाई हुई और मार्च 2017 तक फल आए, यानी जहां सर्दी काफी ठंडी हो वहां मैदानों में खुले खेत में भी फल आ सकता है, लेकिन सीजन छोटा और सर्दी के आखिर का होता है।
किस्में
| किस्म | कहां बताई गई | खासियत |
|---|---|---|
| Chandler, Sweet Charlie | महाबलेश्वर की मुख्य किस्में (दूसरे दर्जे की रिपोर्ट); दोनों असम की सिफारिशों में हैं | बहुत लगाई जाती हैं; अपनी नर्सरी से ठंड और दिन की लंबाई का मेल पक्का कर लें |
| Camarosa, Winter Dawn (Early Dawn) | महाबलेश्वर; असम में Early Dawn और Festival हैं | छत्तीसगढ़ के ट्रायल में Camarosa में एस्कॉर्बिक अम्ल सबसे ज्यादा था लेकिन TSS सबसे कम (9.5 डिग्री Brix) |
| Nabila | IGKV ट्रायल, राजनांदगांव | सबसे ज्यादा उपज, 35.40 टन/हेक्टेयर; सबसे भारी फल (26 ग्राम); TSS 12 डिग्री Brix |
| Kamila | IGKV ट्रायल | उपज में तीसरे नंबर पर; फल 25.6 ग्राम |
| Rania | IGKV ट्रायल | छोटा फल (14.9 ग्राम), TSS 11.6 डिग्री Brix |
- एक जगह का ट्रायल आपकी किस्म तय नहीं करता। छोटे प्लॉट पर दो-तीन किस्मों की तुलना करें, और ऐसी नर्सरी से पौध लें जो वायरस-मुक्त, कोल्ड-स्टोर्ड या tissue culture पौध देती हो; वायरस रनर के जरिए फैलते हैं।
रोपाई और दूरी
- समय: ऊंचाई के हिसाब से सितंबर से नवंबर (महाबलेश्वर में सितंबर, छत्तीसगढ़ के ट्रायल में अक्टूबर, असम की सिफारिश में नवंबर)।
- क्यारियां: 15 सेमी ऊंची और 1.8 मीटर चौड़ी ऊंची क्यारियां, 30 माइक्रोन काली प्लास्टिक मल्च से ढकी; विकल्प के तौर पर 4 से 6 इंच मोटा पुआल। क्राउन को मिट्टी की सतह से ऊपर रखें।
- दूरी: असम 45 x 45 सेमी सुझाता है और NHB मॉडल 30 x 30 सेमी लेता है। खुली जमीन पर 45 x 45 पर प्रति एकड़ करीब 20,000 पौधे (49,000 प्रति हेक्टेयर) और 30 x 30 पर करीब 45,000 प्रति एकड़ (1.1 लाख प्रति हेक्टेयर) बैठते हैं, क्यारियों के बीच के रास्ते घटाने से पहले, जो आमतौर पर चौथाई या उससे ज्यादा जगह ले लेते हैं।
खाद और सिंचाई
- असम की सिफारिश: प्रति वर्ग मीटर क्यारी 5 किलो गोबर की खाद के साथ 10 ग्राम N, 7 ग्राम P और 7 ग्राम K। फॉस्फोरस रोपाई से पहले दें, नाइट्रोजन दो बार में (पहली रोपाई के 3 हफ्ते बाद) और पोटाश फूल आने पर।
- NHB मॉडल: प्रति हेक्टेयर 25 से 50 टन गोबर की खाद (प्रति एकड़ 10 से 20 टन), साथ में प्रति हेक्टेयर 75 से 100 किलो N, 40 से 120 किलो P2O5 और 40 से 80 किलो K2O (प्रति एकड़ 30 से 40 किलो N, 16 से 49 किलो P2O5 और 16 से 32 किलो K2O)। मिट्टी जांच के हिसाब से घटाएं-बढ़ाएं।
- पानी: असम की सिफारिश में 3 से 4 दिन के अंतर पर हल्की सिंचाई, फल आने के समय ज्यादा बार, क्योंकि बार-बार सिंचाई से फल का आकार और उपज बढ़ती है। मल्च के नीचे ड्रिप फल और पत्तियों को सूखा रखती है; देखें drip irrigation और fertilizers।
कीट और रोग
- लाल मकड़ी (red spider mite) और कटवर्म आम कीट हैं (असम की सिफारिश)। NHB सफेद गिडार और रोएंदार सुंडी भी गिनाता है।
- रोग: red stele (Phytophthora), जड़ सड़न, पत्ती धब्बा, ग्रे मोल्ड (Botrytis) और albinism (एक शारीरिक विकार, NHB के अनुसार)। जल निकास अच्छा रखें, रोगी पौधे और फल हटाएं, और पत्ती धब्बा घटाने के लिए फलीदार सब्जियों के साथ फसल चक्र अपनाएं।
- मल्च फल को मिट्टी से दूर रखती है और ग्रे मोल्ड घटाती है। असम की सिफारिश इन समस्याओं के लिए chlorothalonil, spiromesifen, clothianidin, thiamethoxam और fosetyl-Al का नाम लेती है। स्ट्रॉबेरी ताजी खाई जाती है, इसलिए सिर्फ उसी के लिए पंजीकृत उत्पाद इस्तेमाल करें, लेबल की मात्रा और प्रतीक्षा अवधि मानें, और छिड़काव से पहले अपने KVK से पूछें; देखें pests।
कटाई और उपज
- असम की सिफारिश में फल फरवरी से अप्रैल में पकता है; महाबलेश्वर में तुड़ाई नवंबर से शुरू होती है। पास के बाजार के लिए पूरा पका फल तोड़ें; दूर के बाजार के लिए पूरा रंग आने से ठीक पहले, सख्त फल तोड़ें।
- उपज: असम 200 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर (प्रति एकड़ 80 से 100 क्विंटल, यानी 8 से 10 टन) बताता है। NHB औसत के तौर पर 45 से 100 क्विंटल/हेक्टेयर और अच्छे प्रबंधन में 175 से 300 क्विंटल/हेक्टेयर देता है। छत्तीसगढ़ के खुले खेत के ट्रायल में सबसे अच्छी किस्म से 35.4 टन/हेक्टेयर (प्रति एकड़ 14 टन) मिली, जो रिसर्च प्लॉट का नतीजा है, किसान के खेत का औसत नहीं।
लागत और कमाई
- पुराना मॉडल: NHB की एक एकड़ की मॉडल परियोजना (2001-02 के आंकड़ों पर आधारित) में कुल लागत ₹4 लाख है, जिसमें ₹2.41 लाख खेती का खर्च है, और 8 टन पर ₹40 प्रति किलो के भाव से ₹3.2 लाख की आमदनी। ये लागत और भाव दो दशक पुराने हैं और आज के लिए पैमाना नहीं हैं।
- हिसाब कैसे लगाएं: पौधे, प्लास्टिक मल्च, ड्रिप, क्यारी बनाना, मजदूरी (तुड़ाई सबसे बड़ा खर्च है), पैकिंग और ढुलाई जोड़ें, फिर अपेक्षित किलो से भाग दें। उदाहरण के लिए, अगर प्रति एकड़ कुल लागत ₹4 लाख है और 8 टन उपज मिलती है, तो सिर्फ ब्रेक-ईवन के लिए ₹50 प्रति किलो चाहिए; 10 टन पर यह ₹40 प्रति किलो बैठता है।
- लगाने से पहले अपनी नजदीकी मंडी का मौजूदा भाव देखें; mandi bhav पेज पर दर्ज भाव मिलते हैं। पूरे भारत का जांचा हुआ मौजूदा फार्म-गेट भाव नहीं मिला, और सीजन की शुरुआत का भाव चरम के समय से कहीं ऊंचा होता है।
- फसल के लिए कर्ज KCC योजना में संभव है; अपने बैंक से बागवानी की सीमा के बारे में पूछें।
बाजार और जोखिम
- ताजा फल थोक व्यापारियों, शहर के रिटेलरों, होटल और कैफे में जाता है; बचा हुआ फल जैम, क्रश और आइसक्रीम के प्रोसेसरों को जा सकता है। एक दूसरे दर्जे की रिपोर्ट कहती है कि भारत की ज्यादातर स्ट्रॉबेरी महाबलेश्वर से आती है, इसलिए दूसरी जगह के उत्पादक रोपाई से पहले स्थानीय और पास के शहर के खरीदार तय कर लें।
- मुख्य जोखिम हैं जल्दी खराब होना, फल आने के समय तेज बारिश (ग्रे मोल्ड), जल्दी गर्मी आकर सीजन खत्म होना, और रोगी रोपण सामग्री। लंबी ढुलाई के लिए स्ट्रॉबेरी को कोल्ड चेन चाहिए; देखें cold storage subsidy।
- बारिश से बचाव और लंबे सीजन के लिए पॉलीहाउस कवर इस्तेमाल होता है; देखें polyhouse subsidy। बिना मिट्टी की स्ट्रॉबेरी के लिए hydroponics farming देखें।
स्रोत
- National Horticulture Board, Model project report: Strawberry (2001-02 data)
- Assam Agricultural University, Package of Practices for Horticultural Crops of Assam 2021: Strawberry
- Neetu, Sharma and Verma 2020, Varietal screening of strawberry under open field condition in plain region of Chhattisgarh, Journal of Pharmacognosy and Phytochemistry
- Mahabaleshwar strawberry, GI status, area and season (secondary source)
