आलू के लिए खाद और उर्वरक
आलू भारी आहार लेने वाली फसल है जो जमीन के नीचे कंदों के लिए उगाई जाती है, इसलिए खाद योजना को शुरुआती मजबूत पत्तियों और बाद में स्थिर कंद भराव दोनों का साथ देना चाहिए। फसल की जड़ प्रणाली काफी

परिचय
आलू भारी आहार लेने वाली फसल है जो जमीन के नीचे कंदों के लिए उगाई जाती है, इसलिए खाद योजना को शुरुआती मजबूत पत्तियों और बाद में स्थिर कंद भराव दोनों का साथ देना चाहिए। फसल की जड़ प्रणाली काफी उथली और रेशेदार है तथा बढ़ने की अवधि छोटी व तीव्र होती है, यानी पोषक तत्व सही जगह सही समय पर उपलब्ध होने चाहिए। नाइट्रोजन वह पत्ती छतरी बनाती है जो कंद वृद्धि चलाती है, पर देर से अधिक नाइट्रोजन पकना देर करती है और कंद गुणवत्ता व भंडारण घटाती है। पोटाश खास जरूरी है क्योंकि आलू इसे बहुत लेता है और यह कंद आकार, शुष्क पदार्थ व टिकाऊपन सुधारता है। फॉस्फोरस जड़ और कंद बनने में मदद करता है। मिट्टी चढ़ाना टॉप ड्रेसिंग रखने का स्वाभाविक अवसर है। नीचे दी सीमाओं को मार्गदर्शक मानें, मृदा स्वास्थ्य कार्ड या मिट्टी जांच के अनुसार समायोजित करें, और क्षेत्रीय दरें केवीके से पक्की करें।
आलू के लिए अनुशंसित NPK मात्रा
मैदानी जलोढ़ मिट्टी के लिए सामान्य सीमा लगभग 150 से 200 किग्रा नाइट्रोजन, 60 से 90 किग्रा फॉस्फोरस और 100 से 150 किग्रा पोटाश प्रति हेक्टेयर है, जो लगभग 60 से 80 किग्रा नाइट्रोजन, 24 से 36 किग्रा फॉस्फोरस और 40 से 60 किग्रा पोटाश प्रति एकड़ है। पहाड़ी और अधिक उपज वाली स्थितियां नाइट्रोजन व पोटाश ऊंची ले जा सकती हैं, जबकि अम्लीय या काली मिट्टी की अपनी समायोजित दरें हैं। ध्यान दें पोटाश कितना ऊंचा है, क्योंकि आलू पोटाश का बड़ा उपभोक्ता है और कंद गुणवत्ता इसी पर निर्भर है। जैसा आईसीएआर खुद कहता है, पूरे देश के लिए एक आदर्श एनपीके अनुपात नहीं है, क्योंकि जरूरत मिट्टी, जलवायु और किस्म से बदलती है। इन आंकड़ों को शुरुआती सीमा मानें और असली मात्रा मृदा स्वास्थ्य कार्ड या ताजा मिट्टी जांच से तय करें, फिर केवीके से पक्का करें।
डालने का समय और तरीका
रोपाई के समय पूरा फॉस्फोरस, पूरा पोटाश और लगभग आधी से एक तिहाई नाइट्रोजन आधार खुराक के रूप में कूंड में डालें, पर बीज कंदों के सीधे संपर्क से बचाकर। बची नाइट्रोजन टॉप ड्रेसिंग के रूप में दें, आमतौर पर एक या दो किस्तों में, और इसे रोपाई के लगभग 25 से 35 दिन बाद मिट्टी चढ़ाने के साथ समय दें जब पौधे लगभग 15 से 20 सेमी ऊंचे हों। मिट्टी चढ़ाना न केवल विकसित होते कंदों को ढकता और हरापन रोकता है, यह मिट्टी मूंडने से पहले नाइट्रोजन को जड़ क्षेत्र के पास पट्टी में रखने का आदर्श समय है। छतरी पूरी होने के बाद भारी नाइट्रोजन से बचें, क्योंकि देर से नाइट्रोजन कंद पकना देर करती और भंडारण गुणवत्ता घटाती है। कंद भराव के दौरान नमी एक समान रखें, क्योंकि सूखा और जलभराव दोनों फसल को नुकसान करते हैं।
जैविक और जैव उर्वरक
खेत तैयारी के समय 20 से 25 टन प्रति हेक्टेयर, लगभग 8 से 10 टन प्रति एकड़ अच्छी सड़ी गोबर खाद मिट्टी में मिलाएं, या लगभग 5 टन वर्मीकम्पोस्ट प्रति हेक्टेयर डालें। आलू के लिए जैविक पदार्थ से बनी ढीली, हवादार मिट्टी सीधा लाभ है, क्योंकि भुरभुरी मिट्टी में कंद अधिक स्वतंत्रता से फैलते और साफ निकलते हैं। जैविक पदार्थ कंद भराव के दौरान जरूरी पोटाश व नमी भी रोकता है। नाइट्रोजन के लिए एजोटोबैक्टर या एजोस्पाइरिलम और फॉस्फोरस अवशोषण के लिए फॉस्फेट घोलक जीवाणु खाद में मिलाकर या रोपाई पर दें। केवल पूरी सड़ी खाद उपयोग करें, क्योंकि कच्ची खाद स्कैब और अन्य कंद समस्याओं को बढ़ा सकती है। हर मौसम जैविक पदार्थ बढ़ाने से उपज और कंद की चमक दोनों सुधरती हैं।
सूक्ष्म पोषक और कमी के लक्षण
जिंक कई भारतीय मिट्टियों में आलू की सबसे आम सूक्ष्म पोषक कमी है, जो रुकी वृद्धि वाले पौधों, छोटी, कटोरीनुमा या कांस्य रंग की ऊपरी पत्तियों और छोटी गांठों के रूप में दिखती है, इसे जिंक सल्फेट मिट्टी में या 0.5 प्रतिशत छिड़काव से ठीक करें। बोरॉन की कमी से फटे, कॉर्की कंद और भुरभुरे बढ़ते सिरे हो सकते हैं, इसे लगभग 0.1 से 0.2 प्रतिशत सावधान बोरेक्स छिड़काव से ठीक करें, क्योंकि अधिक बोरॉन विषैला है। मैग्नीशियम की कमी पुरानी पत्तियों की शिराओं के बीच पीलेपन से दिखती है, इसे मैग्नीशियम सल्फेट से ठीक करें। मैंगनीज और लोहे की समस्या मुख्यतः क्षारीय मिट्टी पर आती है। कोई भी सूक्ष्म पोषक केवल मिट्टी जांच या पहचाने गए लक्षण के आधार पर दें, सामान्य खुराक कभी न दें।
सुझाव और सावधानियां
नाइट्रोजन बांटें ताकि कुछ आधार में और बाकी मिट्टी चढ़ाने पर टॉप ड्रेसिंग हो, बजाय इसके कि सब रोपाई पर दें जहां वह फसल की जरूरत से पहले बह जाती है। नाइट्रोजन अधिक न दें, खासकर देर से, क्योंकि यह पकना देर करती, शुष्क पदार्थ घटाती और भंडारण बिगाड़ती है। आलू को भरपूर पोटाश दें, क्योंकि यह पोटाश का बड़ा उपभोक्ता है और कंद आकार व गुणवत्ता इसी पर निर्भर हैं। बीज कंदों को गाढ़ी खाद के सीधे संपर्क से दूर रखें ताकि झुलसा न हो। समय पर मिट्टी चढ़ाएं ताकि कंद ढकें, हरापन रुके और टॉप ड्रेसिंग ठीक से रखी जाए। स्कैब से बचने के लिए केवल पूरी सड़ी खाद उपयोग करें। भराव के दौरान नमी एक समान रखें, और पकने के पास भारी सिंचाई रोकें ताकि कंद ठीक से सूखें व टिकें।
ये सामान्य अनुशंसाएं हैं। सही मात्रा के लिए अपने मृदा स्वास्थ्य कार्ड / मिट्टी जांच और स्थानीय KVK की सलाह लें। ज़रूरत से ज्यादा यूरिया न डालें।
सवाल-जवाब
आलू में टॉप ड्रेसिंग कब करूं?
आलू के लिए पोटाश क्यों जरूरी है?
एक एकड़ आलू के लिए एनपीके मात्रा क्या है?
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