प्राकृतिक तरीके से मवेशियों के चारे का प्रबंधन कैसे करें
भारत में अधिकतर किसान अपने पशुओं की देखभाल पारंपरिक तरीके से करते हैं। लेकिन जैसे-जैसे उत्पादन लागत बढ़ती है, प्राकृतिक व कम लागत वाले चारे का महत्त्व बढ़ जाता है। इस लेख में हम जानेंगे कि कैसे प्राकृतिक तरीकों से मवेशियों के पोषण का प्रबंधन किया जा सकता है।
प्राकृतिक चारे के स्रोत
नीचे दिए गए स्रोतों से आप अपने पशुओं के लिए सस्ता और पौष्टिक चारा प्राप्त कर सकते हैं:
- अजोल घास: पौष्टिक हरी घास जो बार-बार उगाई जा सकती है।
- नेपियर घास (गज घास): तेजी से बढ़ने वाली घास, उच्च प्रोटीन युक्त।
- बरसीम और लूसर्न: सर्दियों में बढ़िया हरी घास विकल्प।
- पत्तेदार चारा: लीला सुभबूल, ग्वारपाठा, नीम और अन्य पेड़ों की पत्तियाँ।
- धान/गेहूं की भूसी: सूखा चारा जो ऊर्जा देता है।
प्राकृतिक पूरक आहार
पशुओं को संतुलित पोषण देने के लिए कुछ प्राकृतिक पूरक तत्व जोड़ना जरूरी है:
- गोबर की खाद से बनी सजैव खनिज मिश्रण
- सरसों की खल व तिल की खल – प्रोटीन का बेहतरीन स्रोत
- चने की भूसी – Digestive system सुधारता है
- आंवला और नीम की छाल – रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है
हरित चारे का चक्र बनाए रखें
ध्यान रखें कि सालभर मवेशियों को हरा चारा मिलता रहे:
ग्रीष्म ऋतु:
- गिन्नी/नेपियर घास बोना
- ग्वारपाठा का इस्तेमाल
सर्दी ऋतु:
- बरसीम, लूसर्न, चने के पौधे
मानसून:
- ज्वार, बाजरा, मकई जैसे हरे चारे ऊगाएँ
प्राकृतिक चारा संरक्षण के उपाय
अधिशेष चारा खराब न हो, इसके लिए चारा को संरक्षित करना जरूरी है:
- साइलेज बनाना: हरे चारे को पिट में भरकर बंद करना
- सूखे रूप में भंडारण: सूर्य की रोशनी में सुखाकर बंडल बनाना
नियमित निरीक्षण और संतुलित आहार
हर जानवर के अनुसार खाना देना जरूरी है:
- दूध देने वाली गायों को उच्च प्रोटीन चारा
- गर्भवती मवेशियों को खनिज और विटामिन युक्त चारा
- बछड़ों को प्रोटीन और कैल्शियम युक्त आहार जरूरी
निष्कर्ष
कृषक भाइयों, जब हम अपनी भूमि से मिलने वाले प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते हैं, तो न केवल लागत घटती है बल्कि मवेशियों का स्वास्थ्य भी सुधरता है।
क्या आप भी प्राकृतिक पशु चारा अपनाना चाहते हैं?
तुरंत शुरुआत करें! अपने क्षेत्र में उपलब्ध फसलों और घासों की जानकारी लेकर एक वार्षिक चारा योजना बनाएं। इससे न केवल आपके पशु स्वस्थ रहेंगे, बल्कि आपका डेयरी व्यवसाय भी मजबूत होगा।
अपने नज़दीकी कृषि अधिकारी या पशु चिकित्सक से संपर्क कर उपयुक्त फसल और चारे की सलाह लें।